Tuesday, 30 December, 2008

स्वागत -२००९ - प्रदीप मानोरिया

 
नव  वर्ष  में  वंदन नया , 
उल्लास  नव आशा  नई  |
हो भोर नव आभा  नई, 
रवि  तेज  नव ऊर्जा  नई |
विश्वास  नव उत्साह  नव,
नव चेतना उमंग नई |
विस्मृत जो बीती  बात है ,
संकल्प  नव परनती  नई |
है भावना  परिद्रश्य  बदले , 
अनुभूति नव हो सुखमई |
किंतु हालात  क्या  होते हैं :---
सरकार  नव आकार  नव ,
नेता  नया बातें वही |
दुश्मनी की परम्परा वह , 
जो पडौसी भाई वही |
खेल चूहा बिल्ली का ,
चूहा वही बिल्ली वही |
हमले वह आतंक वो ही,
जेहाद औ मज़हब वही |
मुखिया वही करता वही ,
कहता मैं मुखिया नहीं |
कुछ कर सके सरकार मेरी, 
दिखता उसे कुछ हल नहीं |
अथवा सब कुछ जानते , 
किंतु अरे हिम्मत नहीं |
स्वच्छता का  भरते दम , 
जो स्वच्छ साँसे भी नहीं |
देश की कीमत  नहीं है , 
घूस  औ रिश्वत वही |
है समय का बीतना ही, 
समय की नियति यही |
है नियत सब कुछ जगत में , 
जो हो रहा सब है सही |
==प्रदीप मानोरिया 
094 251 32060 
चूहा - बिल्ली का खेल = भारत पकिस्तान के परस्पर हालात

Friday, 26 December, 2008

धक्का-अष्टक = प्रदीप मानोरिया

धक्का की महिमा बड़ी , करना सोच विचार |
धक्के  से ही होत हैं,  काम अनेक हज़ार ||
धक्के से ही चल रही हिंद देश सरकार |
मेडम धक्का देत हैं , ड्राइवर है सरदार ||1||
धक्का मंदी का पायकर , औंधा शेयर बाज़ार |
अब तेज़ी का मुंह तके , धक्के का इंतज़ार ||2||
इस मंदी के धक्के से , बचा ना कच्चा तेल |
नित नित नीचे दाम हैं , यह धक्के का खेल ||3||
वोटों का धक्का पायकर, बने विधायक आज |
हर नेता यह चाहता , सबको धक्के की आस ||4||
धक्के से चालू करें , जूनी मोटर कार |
ड्राइवर बैठा सीट पर , मालिक धक्कादार ||5||
सुख स्पर्श की चाह में , दिन भर फिरें बाज़ार |
कोहनी धक्का मुक्की से , लहते सुक्ख अपार ||6||
नव दुल्हन है रूम में , दूल्हा खडा है द्वार |
भाभी धक्का देय तो , पहुंचे सुख संसार ||7||
वर्णन धक्का जो सभी , नहीं यहाँ उपयुक्त |
आप विचारें, जान लें , सोच आपकी मुक्त ||8||
= प्रदीप मानोरिया 
0-94-251-32060

Tuesday, 23 December, 2008

दोस्त और बचपन की यादें = Pradeep Manoria

दोस्त तेरी याद बहुत आती है / 
यादें तेरी या उन लम्हों की 
जो बिताये थे तेरे साथ बचपन में /
आज भी ताजा हैं वे याद पचपन में /
दोस्त तेरी याद बहुत आती है /  
स्कूल से गोल मार अमरूद के बगीचे में /
दौड्ते दौड्ते जामफ़ल तोडते / 
माली का डर भी मन में भरा हुआ / 
पेड से गिरने के डर से डरा हुआ / 
यादें आज भी मन को हर्षाती हैं / 
दोस्त तेरी याद बहुत आती है /  
स्कूल के बाहर चाट के ठेले /
बेर कि डलिया और केले / 
खाते खिलाते चिढाते खिलखिलाते / 
पेड की छॊंव मे बैठे बतियाते /
बचपन की बातें भूल नहीं पातीं हैं 
दोस्त तेरी याद बहुत आती है / 
..............प्रदीप मानोरिया 
094-251-32060

Saturday, 20 December, 2008

ताजे दोहे

 
दिल्ली :-
देत दुहाई जो रहे , मानव के अधिकार |
निरस्त पोटा कर दिया ,मनमोहन सरकार ||
नीर समान बहता रहा,निर्दोषों का खून  |
बस वोटों के लोभ में ,टांग दिया क़ानून ||
हमले आतंकी हुए ,बढ़ने लगा दबाब |
तब जाके जागे कहीं, टूटे लोभ के ख्वाव ||
नए नाम नई जिल्द में ,प्रस्तुत वही किताब |
पुन: वही क़ानून अब , वाह मनमोहन साब ||
राजस्थान :-
लोकतंत्र का हो रहा , कैसा ये उपहास |
अनपढ़ भी मंत्री बनी ,वाह कुर्सी की प्यास ||
पाकिस्तान :-
ये कसाब है पाक का , कहने लगे नवाज़ |
जो सबूत थे मांगते , उनकी यह आवाज़ ||
= प्रदीप मानोरिया 
09425132060

Thursday, 18 December, 2008

अथ- जूता वृत्तांत

इक नए इतिहास का निर्माण हो गया |
दुनिया में जूता भी महान हो गया ||
नज़दीक जब आने लगी विदाई की घड़ी |
आफत ये जूता लिए हाथ में खडी ||
बुश की ओर लक्ष्य से सम्मान हो गया |
दुनिया में जूता भी महान हो गया ||
साध लक्ष्य फ़िर जब जैदी ने जूते मारे |
त्वरित गति से झुककर नीचे बच पाये बेचारे ||
नीच क्रिया से मज़हब का सम्मान हो गया |
दुनिया में जूता भी महान हो गया ||
जैदी का यह जूनून मज़हब में नेक है |
पिट कर हुए बेहाल हाड पसली एक है ||
पिटना भी जैदी का ईमान हो गया |
दुनिया में जूता भी महान हो गया ||
क्लिंटन ने पाई विदा मोनिका को चूम के |
बुश ने तो पाया जूता विदाई में झूम के |
जूते का करोड़ों का दाम हो गया 
दुनिया में जूता भी महान हो गया ||
=प्रदीप मानोरिया  094-251-32060

Monday, 8 December, 2008

दंगल के बाद --- प्रदीप मानोरिया

कोई खुश तो कोई खीजा और कोई खामोश है |
मतगणना के परिणामों  से कहीं रोष या जोश है ||
शिव शीला और रमन सिंह ने सत्ता पाई दोबारा है |
जीत गए नेता खुश होते , वोटर फ़िर भी हारा है  ||
राजस्थान में मौजूदा पर नहीं किया विश्वास है  |
वसुंधरा मायूस हुईं क्या,क्या टूटी अब आस है ||
वादों का धर भार कंधे पर पहुंचे सत्ता के पास हैं |
वे वादों को भले ही भूलें , वोटर रखता आस है ||
आस धरे वोटर बैठा है , होता सदा निराश है |
नेता को सता सुख प्यारा, नोट अरु वोट चटास है ||
बड़े बड़े दिग्गज भी  हारे , जो आशा पर जीते हैं |
आज हुआ माहौल जो ऐसा, भरी दुपहरी पीते हैं || 
नये नए चेहरे भी जीते ,दंगल इसी चुनावी में |
कुछ की नैया पार लगी है, चलती लहर प्रभावी में ||
नए विधायक खुशी  असीमित, दिखता भारी जोश है |
मतगणना के परिणामों ने फैलाया आगोश है  || 
कोई खुश तो कोई खीजा और कोई खामोश है |
मतगणना के परिणामों  से कहीं रोष या जोश है ||
=प्रदीप मानोरिया  09425132060 

Friday, 28 November, 2008

मुम्बई २६/११ दहशतगर्दी

पाक तेरी नापाक  निगाहें,  क्या करता इन पर तू नाज़ |
यद्यपि शासन सुप्त हमारा , किंतु जनता जागृत  आज ||
कायर सा ये कदम तुम्हारा , कुत्सित नीयत दिखाई है |
दहशत गर्दी खेल ये खूनी,  मानवता बिसराई है  ||
हिम्मत नहीं सामने आओ , क्यों ना आती तुमको लाज |
पाक तेरी नापाक निगाहें , क्या करता इन पर तू नाज  ||
जो हिस्सा इस तन का ही है , छवि स्वच्छ है दिखलाता |
बाहर से भोंदू बनकर जो , आतंकी हमले करवाता ||
शान हमारी मुम्बई की जो , कहलाता है होटल ताज |
पाक तेरी नापाक  निगाहें,  क्या करता इन पर तू नाज़ |
हम शर्मिन्दा मेहमानों के प्रति , यह संस्कृति हमारी है |
खूनी होली खेलने वाले , क्या ये संस्कृति तुम्हारी है  ||
सीधी अंगुली घी  ना निकले , सीधे सीधे  आओ ना  बाज |
पाक तेरी नापाक  निगाहें,  क्या करता इन पर तू नाज़ |
जो अपनो से विछड गए हैं , ह्रदय चुभी उनकी यह पीर |
दहशत गर्दो ओ आतंकी , तुम लगते संवेदनहीन ||
जिंदा वे  जो हैं संवेदी , तुम पत्त्थर या हो तुम लाश |
पाक तेरी नापाक  निगाहें,  क्या करता इन पर तू नाज़ |
यद्यपि शासन सुप्त हमारा , किंतु जनता जागृत  आज ||
===प्रदीप मानोरिया 

Tuesday, 25 November, 2008

चुनावी चौपाइयां

दंगल की घड़ी अन्तिम  आई , नेताओं ने रार मचाई |
मतदाता ने मौन है धारा, नेता चाहे वोट तुम्हारा  |
नागनाथ कोई साँप नाथ है , कोई फूल तो कोई हाथ है |
बैठ हाथी पर कुछ धाये, कोई कहीं साइकिल ही चलाये |
दल दल से हैं दूर कुछ नेता , वे निर्दलीय कहाते नेता |
चिह्न नगाडा सूरज तारा , वे भी मांगे वोट तुम्हारा |
इक दूजे पर पंक उछालें , अपनी गलती स्वयं दबा ले |
वादे नित नए रोज सुनाएँ, अपनी ढपली राग बजाएं |
मतदाता राजा बन घूमे, प्रत्याशी क़दमों को चूमे |
है वो सिकंदर जो है जीता ,हारा हुआ गम अश्क है पीता |
जीते जो घर बजे नगाडा , कितु वोटर सदा ही हारा  |
प्रदीप मानोरिया 

Saturday, 22 November, 2008

ज्योति = Pradeep Manoria

एक दिया जीवन का ज्योतिर्मय /
पलते पढते बढते जलता रहा / 
तीन दशक से कुछ ज्यादा / 
जीवन पथ पर हुआ अनुबन्धित विवाह संस्था में /
दो नन्ही ज्योति और हुई प्रस्फ़ुटित /
चलता रहा जीवन घडी के पेन्डुलम के साथ /
परिजन पुरजन का प्रेम ले आया पीहर तक /
मेल, मिलाप ,प्रेम ,ताने ,मिलने के बहाने /
अचानक फ़डफ़डाई और ज्योति बुझ गई /
देखते रहे वो ही परिजन दिये की ज्योति का बुझ जाना /
दो नन्ही ज्योति इस ख्याल से गुम /
मुख्य ज्योति के विलय से ऑंखे नम /
चेतनज्योति गई फ़िर किसी दिये में / 
उसी धारा में नये दिये की ओर /
दिखता नहीं संसार का कोई छोर / 
वह ज्योति जाते हुये छोड गई इक सवाल /
ढूंढना होगा हमॆं हल , क्या है संसार का सार ?
जाननी होगी हमें संसार की वास्तविकता /
क्या है हमारा स्वरूप कौन हैं हम ?
कब रूकेगा ये सिलसिला ?
चेतन अविनश्वर तत्व 
क्यों इस नश्वर देह की गुलामी में फ़ंसे है ?
प्रदीप मानोरिया 09425132060

Wednesday, 19 November, 2008

शिक्षा की मंडी कोटा

बेटे बेटी के लिये संजोये / 
क्या ह्सीन ख्वाबों में खोये / 
हर पिता वहीं को दौड रहा है /
दिशा सपनों की मोड रहा है / 
शिक्षा की इस मंडी में / 
कोटा की तलवंडी में /
धंधे का तूफान मचा है / 
इससे नहीं यहॉं कोई बचा है / 
उद्योग क्षेत्र सा विकसित है अब / 
पा के दाखिला पुलकित हैं सब / 
जीवन भर की बचत यहॉं पर / 
करते हैं कुरबान यहॉं पर / 
बच्चों के केरियर के हेतु / 
शायद यही सिध्द हो सेतु / 
बाप इसी सपने को सजाये / 
फलीभूत हों सब आशायें / 
इसी बात पर लुटता जाता / 
सारी बचत तलवंडी में चढाता / 
लुटे अरे दो साल तक, ना हो बच्चा पास |
बाप तो पागल सा फिरे , टूट गई सब आस ||
अपने बच्चे की योग्यता पहले करना जॉंच |
फिर कोटा में भेजना , नहीं आयेग़ी ऑंच ||
by Pradeep Manoria 09425132060

Saturday, 15 November, 2008

भारतीय लोकतंत्र - Pradeep Manoria

राजतंत्र  को हटा प्रजा का लोकतंत्र ले आए | 
प्रगति स्वप्न को भूल ,मंत्र बापू नेहरू के भुलाए ||
समय चक्र के चलते साल हैं साथ बिताये |
किंतु नहीं आकलन इसका पहुँच कहाँ हम पाये ||
भ्रष्टाचार का भूत बहुत नेताओं पर मंडराए |
बहुत हैं अफसर बाबू चपरासी वे भी नहीं बच पाये ||
नेता सत्ता का ऐसा प्रेमी दिन भर स्वप्न सजाये |
करे नोट वोटों की तिजारत ,देश भाड़ में जाए ||
अफसर देश चलाते हैं पर नोट देख ललचायें |
निष्ठा खूंटी पर टांग अरे ये किंचित न शर्मायें ||
लोकतंत्र का चढ़ा मुखौटा लालफीत ही चलायें |
सेवा,पूजा,घूस-ओ-रिश्वत जनता रोज चढाये ||
सरकार हुयी स्वचालित हमारी चालक सोता जाए |
देश की जनता करे सवारी पल पल झटके खाए ||
प्रदीप मानोरिया 
संपर्क 094 25132060 

Wednesday, 12 November, 2008

भ्रष्टाचार के अनेक रंग

एक उच्च पद पर आसीन शासकीय अधिकारी / 
मंह्गे मोबाइल लम्बी गाडी से लेस सूट धारी / 
जीवन में हैरान परेशान तनाव से ग्रस्त / 
भाग दौड और अनजाने भय से त्रस्त / 
दोस्त की सलाह पर तथाकथित  बाबा के पास धाये / 
चरणों में कर नमोस्तु अपनी व्यथा सुनाये / 
बाबा ने कहा एक काम कीजिये आप / 
सुरा सुन्दरी सहित छोड दीजिये पाप / 
अफ़सर ने कहा बाबा जरूर / 
मुझे आपका आदेश मंजूर / 
लेकिन एक चीज से बहुत घबराता हूं / 
आप कहें तो आपको बताता हूं / 
मैं ऐसे विभाग में हूं मेरी ऊपरी कमाई मजबूरी है / 
ना भी चाहूं तो भी ये जरूरी है / 
मैं इस पाप से बहुत घबराता हूं /
छोडना चाहता हूं नहीं छोड पाता हूं 
मै करना चाह्ता हूं प्रायश्चित / 
कोई उपाय बतायें उचित / 
बाबा ने कहा उपाय बहुत सहज और आसान है / 
बच्चा क्यों इतनी सी बात से परेशान है / 
परेशानी छोड और बिल्कुल नहीं घबराना / 
अपनी ऊपरी कमाई का चौथाई हिस्सा यहॉं भिजवाना / 
तेरे सारे पाप हो जायेंगे साफ़ / 
दान धर्म से हो जायेंगे माफ / 
 PRADEEP MANORIA
09425132060

Wednesday, 5 November, 2008

माशूक -- Pradeep Manoria

खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
ज़ीस्त मेरी थी जिनके सहारे अब ये सहारे टूट गये /
तेरे दम पर हमने फानूश तिरंगे मंगवाये /
तेरे सहारे ही ये हमने सुविधा के सामान जुटाये / 
हुई खता आखिर क्या मेरी जो तुम ऐसे रूठ गये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये /
तेरे इश्क में दीवाने हम रांझा से आगे निकले /
तुझको पाने की चाहत में पत्थर हैं वो भी पिघले /
स्याह अंधेरा हमें डराता तुम जो ऐसे रूठ गये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
याद हमें है आज वो लम्हा जब आये थे पहली बार / 
जर्रा जर्रा हुआ था रोशन आमद से मेरा घर द्वार / 
सपनों की सी बातें लगती आप जो पहलू से हैं गये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
तेरे बिना बैचेनी रहती नींद नहीं आ पाती है / 
तेरा साथ है सबब है चैन का ज़ीस्त हंसी हो जाती है / 
ऐसी भी ये क्या रूसबाई वादे तेरे झूठ हुये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये /
बहुत हुई ये ऑंख मिचौली अब कुछ दिन तो रूक जाओ / 
बने सियासी कठपुतली हो लेकिन अब ना तरसाओ / 
बडे शहर तो हो चमकाते कस्बों से क्यों रूठ गये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
नफा सियासी देने को तुम राजा के माशूक बने / 
हम भी आशिक परले तेरे बिल पूरा हर माह भरें
मान भी जाओ बिजली देवी बिन तेरे न काम चले /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
=== प्रदीप मानोरिया 
094 251 32060

Saturday, 1 November, 2008

सम्पूर्ण देश की एक हवा है -- प्रदीप मानोरिया

  • म न से तेरी मंशा का क्या तुझको अनुमान नहीं |
  • खेल ये खूनी कब तक होगा क्या इसका भी भान नहीं ||
  • मुम्बई की भू माँ आँचल सी , सबको इसकी छाँव मिले | 
  • किंतु यू बी आर अरे तुम क्यों बेढंगी चाल चले ||  
  • गुजराती या उत्तर का या फ़िर कन्नड़ वासी है |
  • सब मिलजुल कर प्रेम से रहते सब ही भारतवासी है || 
  • भारत माँ के हर हिस्से में सबको मिलता प्यार हो | 
  • किंतु पवन देश की जो है बनते क्यों ठेकेदार हो || 
  • एक रसोई में है सम्भव सभी प्रेम से खाते हैं | 
  • कोई दाल सब्जी को खाता किसी को चावल भाते हैं || 
  • सभी अमन से रहें कहीं भी सबके मन में प्यार रहे |
  • अपना अपना लोटा छाने सबको पानी की धार मिले || 
  • मुम्बई का आँचल अनादि से प्यार बांटता आया है | 
  • इस आँचल को मत फाडो तुम जिसकी सब पर छाया है || 
  • पहेली :- यू बी आर = ?

Thursday, 30 October, 2008

बुजुर्ग छांव

  • अपनो के विछोह से /
  • बंधे जिनके मोह से / 
  • उनके अवसान से /
  • जीव के प्रयाण से /
  • दुख की गहराई है / 
  • याद बहुत आई है / 
  • जितना मैं भुलाता हूँ /
  • भूल नहीं पाता हूँ / 
  • मुझ पे उनका साया था /
  • हाथों से मुझे खिलाया था / 
  • धूप में कुम्हलाता हूँ /
  •  सोच नहीं पाता हूँ /
  • कैसे अब जी पाऊँगा /
  • नहीं भुला पाऊँगा / 
  • नहीं भुला पाऊँगा, नहीं भुला / पाऊँगा 
Pradeep Manoria 
094-251-32060

Sunday, 26 October, 2008

दीपावली मंगलमय हो -- प्रदीप मानोरिया

भगवान् महावीर का निर्वाण कार्तिक वदी अमावस को हुआ था जिसकी पावन स्मृति में जैन लोग दीपावली के पर्व को अति उत्साह से मनाते हैं , उन महावीर प्रभु की भक्ति में आज से २०० वर्ष पूर्व अशोकनगर जिले के इसागद के कविवार्र श्री भाग चंद जी ने इस भक्ति काव्य की रचना की थी , उसी रचना को हिन्दी पद्य में बदलने का प्रयास किया है . जो आप के समक्ष प्रस्तुत है
  • श्री महावीराष्टक स्त्रोत
  • कविवर पं. भाग चंद जी (मूल भाषा संस्कृत)
  • हिन्दी पद्यानुवाद प्रदीप मानोरिया
  • (गीता छंद )
  • उत्पाद व्यय अरु ध्रोव्य युत जो द्रव्य सब स्पष्टता
  • युगपत झलकते आईने सम ज्ञान कैवल्य आपका
  • सूर्य सम तम हरो प्रभु पथ मोक्ष में आलोक हो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (१)
  • दो नेत्र नीरज आपके , टिमकार नहीं न लालिमा
  • अन्तर व बाहर निर्विकारी ,स्पष्ट ही ये झलकता
  • मुद्रा है पूर्ण ही शांत अरु अति ही विमल यह है प्रभो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (२)
  • ज्यों जाल आभा इन्द्र नमते मुकुट मणियों से बने
  • दो चरण पंकज आपके अति कान्ति युत आभा धरें
  • तिन स्मरण है नीर के सम ज्वाला भव दुःख शमन हो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (३)
  • भाव भक्ति प्रमोद युत मेंढक निकट तुम आ रहा
  • गुण गण समृद्ध जो स्वर्ग निधि को मात्र क्षण में पा गया
  • फ़िर क्या है अचरज भक्त सच्चे मुक्ति को न प्राप्त हों
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (४)
  • तन तप्त स्वर्ण समान आभा ज्ञान तन अन्तर धरें
  • है ज्ञान पट झलकन अनेकों ज्ञेय किंतु अखंड है
  • सिद्धार्थ सुत तदपि अजन्में राग रिक्त अचरज अहो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (५)
  • वाणी प्रभु गंगा की भांति लहर नय निर्मल अहो
  • जल ज्ञान है अगाध प्रभुवर लोक जन स्नान को
  • है आज भी वाणी से परिचित हंस सम बुधि धन्य हों
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (६)
  • वेग अनिर्वार जिसका तीन जग में छा रहा
  • निज आत्म बल से वय कुंवर में काम भट को वश किया
  • सो आप शक्ति अनंत राजें स्फुरित नित्यानंद हो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (७)
  • तुम वैद्य हो निरपेक्ष जग मोह से आरोग्य को
  • नि:स्वार्थ बंधु हो विदित महिमा है मंगल लोक को
  • उत्तम गुणों संयुक्त भव भयभीत साधूशरण हो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (८)
  • (दोहा)
  • महावीराष्टक स्त्रोत यह ,भागचंद कविराज
  • रचा सुभक्ति उर सहित , हित जीवों के काज
  • जो पढता सुनता इसे , भक्ति ह्रदय में लाय
  • निश्चित ही भवि जीव वह , परम गति को पाय

Friday, 24 October, 2008

हैरान दोहे

  • वित्त मंत्री की सीख है , धरें निवेशक धीर |
  • डूबे नित्य बाज़ार है , कौन सुनाएँ पीर ||
  • -
  • मंदी की इस रेस में , डॉलर क्यों मज़बूत |
  • बात समझ से दूर है, कैसा मंदी का भूत ||
  • -
  • स्वर्ण रजत सब खो रहे, नित्य चमक जो भाव |
  • कहाँ रुकेगा जाय कर , खोजो कछु उपाव ||
  • -
  • गर्व सफलता भेजकर, चंदा पर जो यान |
  • विश्व बॉस चिंता करे ,आगे क्यों हिन्दुस्तान ||
  • -
  • दिवाली इस बार की , ली घुंडी से हीन |
  • दिवाला इस पर्व पर , लक्षपति भये दीन ||
प्रदीप मानोरिया

Monday, 20 October, 2008

मुम्बई के लिए पार पत्र

  • हमारे एक मित्र बड़े चहक रहे थे 
  • यात्रा के सपनों से महक रहे थे  
  • बोले आ रहा है त्योहारी अवकाश 
  • मुंबई में देखेंगे दीपावली का प्रकाश  
  • कार्यक्रम बनाया है करके गहन विचार 
  • जा रहे हैं शीघ्र ही हम मुंबई सपरिवार  
  • तैयारी पूरी है सब हो गई है आसानी  
  • यात्रा आरक्षण भी पुष्ट है कोई नही है परेशानी  
  • भली भांति पहुँच कर खूब घूमेंगे  
  • जुहू पर नहायेंगे पीयेंगे नाचेंगे झूमेंगे  
  • मैंने कहा मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं
  • परन्तु मन में खटक रही एक बात है  
  • मुम्बई जाने से पूर्व मुम्बैई के लिए पार पत्र बनवाइए 
  • इस पासपोर्ट पर मुंबई के राज साहेब से अनुमति मंगवाइये
  •  
  • मेरी इस सलाह पर अमल करना है सावधानी 
  • तभी यह सम्भव है कि न हो जन माल कि हानि
  • उत्तर भारतीय का मुंबई में बिला-इजाज़त प्रवेश खतरनाक है 
  • क्योंकि मुम्बैई जिनके बाप की है उनकी ही वहाँ धाक है  
  • आप पर्यटक हो अथवा हो परीक्षार्थी 
  • मुम्बई की हवा हो गई है बहुत स्वार्थी 
  • वहां आपको गर शान्ति से घूमना और मज़े उठाना है  
  • तो हवा के मालिक को सर झुकाकर उनकी अनुमति मंगाना है  
  • प्रदीप मानोरिया २० अक्टूबर २००८

Thursday, 16 October, 2008

चुनावी दंगल - प्रदीप मानोरिया

  • रणभेरी की गूँज उठी अब निर्वाचन आयोग से
  • पाँच राज्य में मचेगा दंगल, जीतें भाग्य संयोग से
  • नेता व्यस्त अब हर स्तर के कोई न कोई काम से
  • जाग पड़े हैं उठ बैठे हैं , सोते थे आराम से
  • कोई मांगे कोई देता कोई टिकिट दिलाता है
  • सबको मिलता टिकिट कहाँ कोई कोई ही पाता है
  • जो न पाता टिकिट वही फ़िर जुड़ता सेबोटेज से
  • रणभेरी की गूँज उठी अब निर्वाचन आयोग से
  • पाँच राज्य में मचेगा दंगल, जीतें भाग्य संयोग से
  • झंडे डंडे चर्चा पर्चा मंच कहीं या माइक है
  • जुटे पड़े हैं सब ही देखो यद्यपि नहीं वे लायक है
  • घूमे घर घर दर दर प्रत्याशी याचें सबसे वोट है
  • नत मस्तक कर जोर भंगिमा मानो गर्दन में चोट है
  • झूठे आश्वासन लेकर घूमे . उपजे स्वारथ की कोख से
  • रणभेरी की गूँज उठी अब निर्वाचन आयोग से
  • पाँच राज्य में मचेगा दंगल, जीतें भाग्य संयोग से
  • लोक तंत्र को टांग खूंटी पर चलते चाल दुधारी हैं
  • साम दाम और दंड भेद , डंडे गुंडे तैयारी है
  • वोटर देखे टुकुर टुकुर सब , वो ही एक बेचारा है
  • विजय पराजय कोई की हो वोटर सदा ही हारा है
  • यह दंगल नेता को प्यारा, वोटर पीड़ित इस रोग से
  • रणभेरी की गूँज उठी अब निर्वाचन आयोग से
  • पाँच राज्य में मचेगा दंगल, जीतें भाग्य संयोग से
  • रचना == प्रदीप मानोरिया १७ अक्टूबर २००८