Sunday, 27 July, 2008

ज़ज्बात

खामोश तन्हा रात में सदा किस की रही होगी , ये हवा की आवारगी की दस्तक रही होगी / वक्‍त था मौका भी था फ़िर भी बयाँ न कर सके । इजहारे इश्क में शायद कुछ हया रही होगी / जामो मीना मय सभी लेकिन नहीं शुरूर था , इनायत-ऐ-साकी में आज कुछ कमी रही होगी / जीने की आरजू न रही इंतजार अब मौत का , उनकी दुआ में आज कुछ माकूलियत नहीं होगी / राज बे-परदा हुये राजदारी अब नहीं / अब निगाहों की शरम भी बाकी नहीं होगी / इशक की शै है कठिन कहकर दिखो हैरान तुम , खुद से तुमने कभी आशिकी की नहीं होगी / Pradeep Manoria (Cell No. +919425132060)

Saturday, 26 July, 2008

बरसात

तपन जेठ की सहसा नभ में बदरा कारे घिर आए रिमझिम रिमझिम बरस बरस के गीत राग मल्हार सुनाये तन मन शीतल कर डाला है मौसम ने लेकर अंगडाई देकर दस्तक ठंडी बूंदों ने जेठ मास में तपन बुझाई गति वृद्धि वर्षा रिमझिम से अरे झमाझम बरस रही गली गली पानी में डूबी भर पानी से खूब बही अधनंगे बच्चे गलियों में आनंदित हो खेल रहे बना बना कागज़ की नावें तेज़ गति से बहती रहे बैठ गोख में गरम पकौडे और चाय का ले प्याला मज़ा फुहार का बैठे बैठे बातों का घेरा डाला तपन जेठ की सहसा नभ में बदरा कारे घिर आए रिमझिम रिमझिम बरस बरस के गीत राग मल्हार सुनाये रचना = प्रदीप मानोरिया संपर्क ०९४२५१३२०६०

zindgee

अफ़साना ज़िंदगी का हम कैसे तुम्हे सुनाये सूखा है सबका गुलशन कैसे बहारें लायें इस रंजोगम के बिन नहीं, दुनिया में है कोई खुशियों के चंद लम्हे सौगात गम भुलाए ज़िंदगी में गम ही सही इक पल का है फकत वो पल है जाने वाला , इसका मज़ा उठाएं उनको खुशी मिली है हकदार जो थे इसके उनकी खुशी से हम क्यों गम अपने को बढायें हो कितना भी कठिन अरे , जीवन का ये सफर गिर गिर के फ़िर संभालना ,आगे ही बढ़ते जाएँ अफ़साना ज़िंदगी का हम कैसे तुम्हे सुनाये सूखा है सबका गुलशन कैसे बहारें लायें == प्रदीप मानोरिया

SAMVEDNA

बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर किंतु लेखनी सूखी रह्ती निर्धन की कठिनाई पर , चिंता है किंतु न चिंतन बढ़ती हुई महंगाई पर एक बार तो लिख कर देखो ठग वायदा बाज़ारों पर बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर तपे जेठ की घोर दुपहरी , बे-घर रह मैदानों में , लथपथ रहे पसीना तन पर , करते काम खदानों में एक बार तो छूकर देखो उन दिल की दीवारों पर बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर जाडों में तन रहे ठिठुरता अधनंगे रह सड़कों पर , छोटी कथरी खींच तान कर डाल रहा जो लड़कों पर एक बार तो हाथ रखो अब इन मजबूरी के तारों पर बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर निर्धन की कुटिया छप्पर की टपक रही बरसातों में , बर्तन सारे बिछा फर्श पर जाग रहा जो रातों में एक बार तो लिख कर देखो इनकी करुण पुकारों पर बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर प्रदीप मानोरिया Contact 09425132060

CAREER COUNCILING

हमारे पडौसी मौजीलाल का परिवार भोला सहज और मिलनसार एक दिन अचानक हमारे घर पर आए थोड़े से चिंतित और थोड़े से घबराए बोले मोहल्ले के बच्चे कितने आगे आ गए कोई आई आई टी एम् बी ऐ या मेडीकल में प्रवेश पा गए मैं भी अपने बालक के लिए चिंतित और परेशान हूँ पढाई में है कमज़ोर अत: अधिक हैरान हूँ पढाई में कमज़ोर कमजोरी नहीं मजबूती है ऐसी प्रतिभाएं ही तो नए आयाम छूती हैं मेरी बात सुनकर चकरा गए मौजीलाल बोले आप समझे नहीं सवाल मैंने बात को आगे बढाया मौजीलाल को ठीक से समझाया ऐसी प्रतिभाओं के लिए राजनीती उपयुक्त है इसका कैरियर सदैव शिक्षा की अनिवार्यता से मुक्त है अपने बेटे को इसी क्षेत्र में आगे बढाइये थोडा सा त्याग है बाद में जीभर कर नोट कमाइए प्रशिक्षण दिलाइये झंडे डंडे नारे लगाने का दिग्गज नेताओं के चमचे और चापलूस बन जाने का थोड़े ही समय में फूटकर रकम कमाने लगेगा धीरे धीरे स्थानीय जन वर्ग में पैठ बनाने लगेगा मौका देखकर छोटा मोटा चुनाव लड़वाइये दो तीन बार हारने के बाद खर्चा करके जितवाइये चुनाव जीतकर इसका जादू छाने लगेगा आपका चिरंजीव अच्छा खासा कमाने लगेगा यदि बन गया सांसद या विधायक पूरे परिवार के लिए हो जायेगा सुखदायक सदन में वोट डालने और नही डालने की कीमत ले आयेगा एक ही झटके में मौजीलाल वह करोड़ों कमाएगा कैरियर बनाने को यह क्षेत्र सबसे सुंदर है थोड़ी सी सफलता के बाद तो रकम का समुन्दर है ===प्रदीप मानोरिया

Remote Love

प्यार उससे जिसको कभी देखा नहीं तस्वीर नज़रों में रहे जुबाँ बयाँ ना कर सके दिल दास्ताँ कहता रहे उनकी हर इक अदा है कातिल बड़ी , बन्दा यह मर मर के भी जिंदा रहे नींद भी आती नहीं बंद आँखे या खुली उनके ख्वावों में यह रात नागिन सी रहे सुबह उठ कर ढूंढते हैं निशाँ ख्वावो के मगर तनहा मैं तनहा है कमरा तनहा ही बिस्तर रहे है तमन्ना दीदार की वह रुख हसीं मैं देख लूँ उसने कहा मुश्किल , तमन्ना ख्वाव में ही बस रहे प्यार उससे जिसको कभी देखा नहीं तस्वीर नज़रों में रहे जुबाँ बयाँ ना कर सके दिल दास्ताँ कहता रहे = Pradeep Manoria Cell No. 094-251-32060

PAPPU PASS HO GAYA (22ND JULY2008-SANSAD BHAVAN)

पप्पू पास हो गया !

सन्दर्भ : 22 जुलाई 2008 संसद भवन

संसद का काला इतिहास हो गया

पप्पू हमारा देखो पास हो गया

नोटों की चोट में वोटों के खेल से

मतलबी घटकों के स्वार्थ के मेल से

सरकारी खेमे में उजास हो गया

पप्पू हमारा देखो पास हो गया

संसद का काला इतिहास हो गया

शत्रु मिल एक हुए दोस्ती की रेल में

कौन कौन आन मिला पप्पू की भेल में

पप्पू का मुँह झकझकास हो गया

पप्पू हमारा देखो पास हो गया

संसद का काला इतिहास हो गया

कुर्सी का लोभ दे वोट को कबाड़ के

सत्ता की धौंस से किसी भी जुगाड़ से

देखो अमर कितना खास हो गया

पप्पू हमारा देखो पास हो गया

संसद का काला इतिहास हो गया

समझोता एटम का होगा विदेश से

उनको ना लेना देना अपने इस देश से

शायद ये देश का विकास हो गया

पप्पू हमारा देखो पास हो गया

संसद का काला इतिहास हो गया

= प्रदीप मानोरिया

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