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Thursday, 16 October 2008

चुनावी दंगल - प्रदीप मानोरिया

  • रणभेरी की गूँज उठी अब निर्वाचन आयोग से
  • पाँच राज्य में मचेगा दंगल, जीतें भाग्य संयोग से
  • नेता व्यस्त अब हर स्तर के कोई न कोई काम से
  • जाग पड़े हैं उठ बैठे हैं , सोते थे आराम से
  • कोई मांगे कोई देता कोई टिकिट दिलाता है
  • सबको मिलता टिकिट कहाँ कोई कोई ही पाता है
  • जो न पाता टिकिट वही फ़िर जुड़ता सेबोटेज से
  • रणभेरी की गूँज उठी अब निर्वाचन आयोग से
  • पाँच राज्य में मचेगा दंगल, जीतें भाग्य संयोग से
  • झंडे डंडे चर्चा पर्चा मंच कहीं या माइक है
  • जुटे पड़े हैं सब ही देखो यद्यपि नहीं वे लायक है
  • घूमे घर घर दर दर प्रत्याशी याचें सबसे वोट है
  • नत मस्तक कर जोर भंगिमा मानो गर्दन में चोट है
  • झूठे आश्वासन लेकर घूमे . उपजे स्वारथ की कोख से
  • रणभेरी की गूँज उठी अब निर्वाचन आयोग से
  • पाँच राज्य में मचेगा दंगल, जीतें भाग्य संयोग से
  • लोक तंत्र को टांग खूंटी पर चलते चाल दुधारी हैं
  • साम दाम और दंड भेद , डंडे गुंडे तैयारी है
  • वोटर देखे टुकुर टुकुर सब , वो ही एक बेचारा है
  • विजय पराजय कोई की हो वोटर सदा ही हारा है
  • यह दंगल नेता को प्यारा, वोटर पीड़ित इस रोग से
  • रणभेरी की गूँज उठी अब निर्वाचन आयोग से
  • पाँच राज्य में मचेगा दंगल, जीतें भाग्य संयोग से
  • रचना == प्रदीप मानोरिया १७ अक्टूबर २००८