
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
सभी मनाते पर्व देश का आज़ादी की वर्षगांठ है
वक्त है बीता धीरे धीरे साल एक और साठ है
बहे पवन परचम फहराता याद जिलाता जीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
जनता सोचे किंतु आज भी क्या वाकई आजाद हैं
भूले मानस को दिलवाते नेता इसकी याद हैं
मंहगाई की मारी जनता भूल गई ये जीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
हमने पाई थी आज़ादी लौट गए अँगरेज़ हैं
किंतु पीडा बंटवारे की दिल में अब भी तेज़ है
भाई हमारा हुआ पड़ोसी भूले सारी प्रीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
===प्रदीप मानोरिया
9 comments:
बहुत बढिया.लिखते रहें.
कृपा वर्ड वेरिफिकेशन हटा लेवे.. टिप्पणी देने में सुविधा होगी.
बहुत अच्छा लिखा है. सस्नेह
आपने सचमुच देश के प्रति सच्चा प्रेम दर्शाया है!
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं,
वह हृदय नहीं बस पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
सुन्दर प्रस्तुति। सादर- कुन्दन कुमार मल्लिक
"काव्य पल्लव"
चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है. लिखते रहें.
bahut badia,
janta ki peeda aapne likhi
likte rahiye
नहीं संगठित सज्जन लोग । रहे इसी से संकट भोग ॥
बहुत अच्छी रचना. शुक्रिया.
गीत के रूप में आपने पर्व को मनाते हुए यथार्थ से भी परिचित करा दिया
हमने पाई थी आज़ादी लौट गए अँगरेज़ हैं
किंतु पीडा बंटवारे की दिल में अब भी तेज़ है
भाई हमारा हुआ पड़ोसी भूले सारी प्रीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
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