Saturday 26 July 2008

SAMVEDNA

बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर किंतु लेखनी सूखी रह्ती निर्धन की कठिनाई पर , चिंता है किंतु न चिंतन बढ़ती हुई महंगाई पर एक बार तो लिख कर देखो ठग वायदा बाज़ारों पर बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर तपे जेठ की घोर दुपहरी , बे-घर रह मैदानों में , लथपथ रहे पसीना तन पर , करते काम खदानों में एक बार तो छूकर देखो उन दिल की दीवारों पर बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर जाडों में तन रहे ठिठुरता अधनंगे रह सड़कों पर , छोटी कथरी खींच तान कर डाल रहा जो लड़कों पर एक बार तो हाथ रखो अब इन मजबूरी के तारों पर बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर निर्धन की कुटिया छप्पर की टपक रही बरसातों में , बर्तन सारे बिछा फर्श पर जाग रहा जो रातों में एक बार तो लिख कर देखो इनकी करुण पुकारों पर बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर प्रदीप मानोरिया Contact 09425132060

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