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Wednesday, 27 August 2008

ज़ज्बात

खामोश तन्हा रात में सदा किस की रही होगी , ये हवा की आवारगी की दस्तक रही होगी / वक्‍त था मौका भी था फ़िर भी बयाँ न कर सके । इजहारे इश्क में शायद कुछ हया रही होगी / जामो मीना मय सभी लेकिन नहीं शुरूर था , इनायत-ऐ-साकी में आज कुछ कमी रही होगी / जीने की आरजू न रही इंतजार अब मौत का , उनकी दुआ में आज कुछ माकूलियत नहीं होगी / राज बे-परदा हुये राजदारी अब नहीं / अब निगाहों की शरम भी बाकी नहीं होगी / इशक की शै है कठिन कहकर दिखो हैरान तुम , खुद से तुमने कभी आशिकी की नहीं होगी / Pradeep Manoria