ज से जूता, ज से जैदी, ज से ही जरनैल है |
वैश्विक यह संस्कृति हमारी कितना सुन्दर मेल है ||
कलम नवीसी कलम सिपाही दोनों ही पत्रकार हैं |
छोड़ कलम को आज बनाया जूते को हथियार है ||
अंतर ह्रदय ज्वालामुखी कैसा, कैसा ऐसा क्रोध है |
स्याही सूखीआज कलम की या विरोध नव शोध है ||
सत्याग्रह से बात चली जूते तक यह आई है |
नव विकास की नव धारा यह अर्पित लाख दुहाई है ||
रचना प्रदीप मनोरिया ०९४२५१३२०६०