- हमारे एक मित्र बड़े चहक रहे थे
- यात्रा के सपनों से महक रहे थे
- बोले आ रहा है त्योहारी अवकाश
- मुंबई में देखेंगे दीपावली का प्रकाश
- कार्यक्रम बनाया है करके गहन विचार
- जा रहे हैं शीघ्र ही हम मुंबई सपरिवार
- तैयारी पूरी है सब हो गई है आसानी
- यात्रा आरक्षण भी पुष्ट है कोई नही है परेशानी
- भली भांति पहुँच कर खूब घूमेंगे
- जुहू पर नहायेंगे पीयेंगे नाचेंगे झूमेंगे
- मैंने कहा मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं
- परन्तु मन में खटक रही एक बात है
- मुम्बई जाने से पूर्व मुम्बैई के लिए पार पत्र बनवाइए
- इस पासपोर्ट पर मुंबई के राज साहेब से अनुमति मंगवाइये
- मेरी इस सलाह पर अमल करना है सावधानी
- तभी यह सम्भव है कि न हो जन माल कि हानि
- उत्तर भारतीय का मुंबई में बिला-इजाज़त प्रवेश खतरनाक है
- क्योंकि मुम्बैई जिनके बाप की है उनकी ही वहाँ धाक है
- आप पर्यटक हो अथवा हो परीक्षार्थी
- मुम्बई की हवा हो गई है बहुत स्वार्थी
- वहां आपको गर शान्ति से घूमना और मज़े उठाना है
- तो हवा के मालिक को सर झुकाकर उनकी अनुमति मंगाना है
- प्रदीप मानोरिया २० अक्टूबर २००८
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Monday, 20 October 2008
मुम्बई के लिए पार पत्र
Monday, 13 October 2008
कलेंडर (Calendar)
- विषय, वर्ग और आदतों को बढावा देने नए प्रकार का कलेंडर बुना
- हर एक के दिवस को मनाने कोई न कोई दिन चुना
- इस प्रकार राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ये विभिन्न दिवस मनाये जाते है
- वे कभी शिक्षक दिवस, हास्य दिवस या मातृ दिवस कहलाते है
- किंतु यह बिडम्बना है आज की
- अथवा खुमारी है समाज की
- अब स्वयं शिक्षक ही शिक्षक दिवस मनाता है
- स्वयं ही दरी जाजम और कुर्सी बिछाता है
- इन्जीनीर्यस ही इन्जीनीर्यस डे का करते हैं आयोजन
- एक मुख्य अतिथि कुछ जलपान या भोजन
- हास्य दिवस पर हंसने वाले इकठ्ठे हो जाते है
- हंसने वालों को हंसने के फायदे समझाते हैं
- हिन्दी दिवस की भी भिन्न नही बीमारी है
- इसे मनाने की कलमकार की ही जिम्मेदारी है
- वे कलमकार श्रोताविहीन कक्ष में करते हैं विचार
- परस्पर हिन्दी का दुखडा रोकर कर लेते हैं स्वल्पाहार
- गर ऐसा ही आलम रहा बरकरार
- सोता रहा समाज और ऊंघती रही सरकार
- तो फ़िर शहीद दिवस कैसे मनाया जायेगा ?
- इसे मनाने क्या कोई शहीद यहाँ वापिस आयेगा ?
- रचना प्रदीप मनोरिया
Friday, 10 October 2008
मुम्बई उनके बाप की
- लोकतंत्र की नई परिभाषा, पेश-ऐ-नज़र है आपकी
- वह बच्चे अब कहने लगे हैं, मुम्बई मेरे बाप की
- सांस जब लोगे छोड़ोगे, मुंबई में जो आप की
- उनका भी हिसाब दे देना, मुम्बई जिनके बाप की
- रोटी खाई कितनी है और, साथ दाल या साग की
- रखना होगा अब हिसाब क्यों? मुंबई उनके बाप की
- बच्चो को शाला भेजो या, दफ्तर दुकान जो आपकी
- कब आना जाना हुआ है कैसे ,मुंबई उनके बाप की
- साँसे खाना आना जाना ,गणना सब होगी आपकी
- सबका मालिक एक वही है, मुंबई जिनके बाप की
- भाषाविद हे ज्ञानी कहना, भाषा क्या कहती आपकी
- कौन तंत्र मुंबई में लागू मुम्बई जिनके बाप की
- रचना प्रदीप मानोरिया
Sunday, 5 October 2008
नैनो की विदाई
- अब छोड़ के यह सिंगूर . कि जाना मुझको है अब दूर
- यही नैनो की कहानी है बसा नयनों में पानी है
- छोड़ के ये बंगाली साया , इसको गुज्जू देश है भाया
- पहुँच के भुज में बनेगी फ़िर ये सड़कों की जो हूर
- यही नैनो की कहानी है बसा नयनों में पानी है
- ममता की निर्ममता भारी , मिष्ट स्वाद को किया है खारी
- रतन जी टाटा की मजबूरी ,जाना है अब दूर
- यही नैनो की कहानी है बसा नयनों में पानी है
- बेटी बंगाल की हुयी पराई , मोदी के घर हुयी सगाई
- कच्छ देश में उसी वेश में, चमकेगा फ़िर नूर
- यही नैनो की कहानी है बसा नयनों में पानी है
- सपना टाटा का बड़ा ही जूना, टूटेगा अब यह कबहू ना
- कारण टाटा उद्योगों में, रहे सदा ही शूर
- यही नैनो की कहानी है बसा नयनों में पानी है
Friday, 3 October 2008
१२३ परमाणु करार
- आज हमारे पडौसी श्री राम अवतार
- भोर ही पधारे लेकर गरमागरम अखवार
- बोले भाई साहेब बहुत बहुत बधाई
- कहकर जलेबी की पुडिया आगे बढाई
- मैंने प्रश्नवाचक भंगिमा बनाई
- तब उन्होंने ख़बर सुनाई
- जिसके लिए प्रधानमंत्री जी थे बेकरार
- आख़िर हो ही गया वो परमाणु करार
- राम अवतार ने अपना मुंह फ़िर खोला
- और बड़े विश्वास से बोला
- कि देश की जनता अब लाभ उठाएगी
- बिजली की कटौती कम हो जायेगी
- पूरी बिजली और पानी की समस्या सुलझेगी
- परेशान जनता भी अब चैन से रह लेगी
- मंहगाई जो छु रही थी आसमान
- उस पर भी कसेगी अब कमान
- मैंने तब राम अवतार के सपनो को विराम दिया
- जैसे तैसे मिथ्या आशावादी रामअवतार को चुप किया
- मैंने कहा अरे राम अवतार ज़रा मेरी भी सुनो
- सुबह सुबह से ही शेखचिल्ली मत बनो
- जो बिजली पानी की समस्या और मंहगाई का बुखार है
- उसका कारण अराजकता और भ्रष्टाचार है
- यह परमाणु करार तुम्हारे काम का नहीं है
- इससे हम तुम को कोई आराम नहीं है
- यह तो मुद्दे की जड़ से उत्पन्न दंभ का परिणाम है
- हम तो उतने ही मजबूर है इससे हमारा क्या काम है रचना प्रदीप मानोरिया
Sunday, 21 September 2008
टी वी सीरियल में नारी

- सास भी कभी बहू थी कसक कसौटी आदि आदि
- सामाजिक मूल्यो की होती हुई बर्बादी
- ईर्ष्या और दम्भ से भरे नारी के चरित्र
- कुटिलता की कहानी कहते ये चल चित्र
- पहले तो थी दो एक मन्थरा व कैकेई
- अचानक ये टी वी मै सैकडौ कैसै हो गई
- स्वेटर बुनने वाली नारी यहॉ जाल बुनती है
- दूसरे को मात देने की नई नई चाल चुनती है
- कुटिल कल्पनाएँ ये तान्डव ये खेल
- हमारी सन्सकृति से खाता नही मेल
- बिना बलाऊज की पहनी हुई साडिया
- वस्त्र के अभाव से जूझती हुई नारिया
- टी वी सिनेमा थे हमारी समाज के आइने
- आज किन्तु बदल चुके है इसके मायने
- अनेकता मै एकता इस देश की मिसाल है
- स्टार की एकता का ही चल रहा कमाल है
- रचना == प्रदीप मानोरिया
- चित्र स्टार टीवी से साभार
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