
- सास भी कभी बहू थी कसक कसौटी आदि आदि
- सामाजिक मूल्यो की होती हुई बर्बादी
- ईर्ष्या और दम्भ से भरे नारी के चरित्र
- कुटिलता की कहानी कहते ये चल चित्र
- पहले तो थी दो एक मन्थरा व कैकेई
- अचानक ये टी वी मै सैकडौ कैसै हो गई
- स्वेटर बुनने वाली नारी यहॉ जाल बुनती है
- दूसरे को मात देने की नई नई चाल चुनती है
- कुटिल कल्पनाएँ ये तान्डव ये खेल
- हमारी सन्सकृति से खाता नही मेल
- बिना बलाऊज की पहनी हुई साडिया
- वस्त्र के अभाव से जूझती हुई नारिया
- टी वी सिनेमा थे हमारी समाज के आइने
- आज किन्तु बदल चुके है इसके मायने
- अनेकता मै एकता इस देश की मिसाल है
- स्टार की एकता का ही चल रहा कमाल है
- रचना == प्रदीप मानोरिया
- चित्र स्टार टीवी से साभार