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Wednesday, 12 November 2008

भ्रष्टाचार के अनेक रंग

एक उच्च पद पर आसीन शासकीय अधिकारी / 
मंह्गे मोबाइल लम्बी गाडी से लेस सूट धारी / 
जीवन में हैरान परेशान तनाव से ग्रस्त / 
भाग दौड और अनजाने भय से त्रस्त / 
दोस्त की सलाह पर तथाकथित  बाबा के पास धाये / 
चरणों में कर नमोस्तु अपनी व्यथा सुनाये / 
बाबा ने कहा एक काम कीजिये आप / 
सुरा सुन्दरी सहित छोड दीजिये पाप / 
अफ़सर ने कहा बाबा जरूर / 
मुझे आपका आदेश मंजूर / 
लेकिन एक चीज से बहुत घबराता हूं / 
आप कहें तो आपको बताता हूं / 
मैं ऐसे विभाग में हूं मेरी ऊपरी कमाई मजबूरी है / 
ना भी चाहूं तो भी ये जरूरी है / 
मैं इस पाप से बहुत घबराता हूं /
छोडना चाहता हूं नहीं छोड पाता हूं 
मै करना चाह्ता हूं प्रायश्चित / 
कोई उपाय बतायें उचित / 
बाबा ने कहा उपाय बहुत सहज और आसान है / 
बच्चा क्यों इतनी सी बात से परेशान है / 
परेशानी छोड और बिल्कुल नहीं घबराना / 
अपनी ऊपरी कमाई का चौथाई हिस्सा यहॉं भिजवाना / 
तेरे सारे पाप हो जायेंगे साफ़ / 
दान धर्म से हो जायेंगे माफ / 
 PRADEEP MANORIA
09425132060

Wednesday, 5 November 2008

माशूक -- Pradeep Manoria

खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
ज़ीस्त मेरी थी जिनके सहारे अब ये सहारे टूट गये /
तेरे दम पर हमने फानूश तिरंगे मंगवाये /
तेरे सहारे ही ये हमने सुविधा के सामान जुटाये / 
हुई खता आखिर क्या मेरी जो तुम ऐसे रूठ गये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये /
तेरे इश्क में दीवाने हम रांझा से आगे निकले /
तुझको पाने की चाहत में पत्थर हैं वो भी पिघले /
स्याह अंधेरा हमें डराता तुम जो ऐसे रूठ गये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
याद हमें है आज वो लम्हा जब आये थे पहली बार / 
जर्रा जर्रा हुआ था रोशन आमद से मेरा घर द्वार / 
सपनों की सी बातें लगती आप जो पहलू से हैं गये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
तेरे बिना बैचेनी रहती नींद नहीं आ पाती है / 
तेरा साथ है सबब है चैन का ज़ीस्त हंसी हो जाती है / 
ऐसी भी ये क्या रूसबाई वादे तेरे झूठ हुये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये /
बहुत हुई ये ऑंख मिचौली अब कुछ दिन तो रूक जाओ / 
बने सियासी कठपुतली हो लेकिन अब ना तरसाओ / 
बडे शहर तो हो चमकाते कस्बों से क्यों रूठ गये /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
नफा सियासी देने को तुम राजा के माशूक बने / 
हम भी आशिक परले तेरे बिल पूरा हर माह भरें
मान भी जाओ बिजली देवी बिन तेरे न काम चले /
खुली ऑंख के ख्वाब सुहाने क्यों ये अचानक टूट गये / 
=== प्रदीप मानोरिया 
094 251 32060

Thursday, 30 October 2008

बुजुर्ग छांव

  • अपनो के विछोह से /
  • बंधे जिनके मोह से / 
  • उनके अवसान से /
  • जीव के प्रयाण से /
  • दुख की गहराई है / 
  • याद बहुत आई है / 
  • जितना मैं भुलाता हूँ /
  • भूल नहीं पाता हूँ / 
  • मुझ पे उनका साया था /
  • हाथों से मुझे खिलाया था / 
  • धूप में कुम्हलाता हूँ /
  •  सोच नहीं पाता हूँ /
  • कैसे अब जी पाऊँगा /
  • नहीं भुला पाऊँगा / 
  • नहीं भुला पाऊँगा, नहीं भुला / पाऊँगा 
Pradeep Manoria 
094-251-32060

Sunday, 26 October 2008

दीपावली मंगलमय हो -- प्रदीप मानोरिया

भगवान् महावीर का निर्वाण कार्तिक वदी अमावस को हुआ था जिसकी पावन स्मृति में जैन लोग दीपावली के पर्व को अति उत्साह से मनाते हैं , उन महावीर प्रभु की भक्ति में आज से २०० वर्ष पूर्व अशोकनगर जिले के इसागद के कविवार्र श्री भाग चंद जी ने इस भक्ति काव्य की रचना की थी , उसी रचना को हिन्दी पद्य में बदलने का प्रयास किया है . जो आप के समक्ष प्रस्तुत है
  • श्री महावीराष्टक स्त्रोत
  • कविवर पं. भाग चंद जी (मूल भाषा संस्कृत)
  • हिन्दी पद्यानुवाद प्रदीप मानोरिया
  • (गीता छंद )
  • उत्पाद व्यय अरु ध्रोव्य युत जो द्रव्य सब स्पष्टता
  • युगपत झलकते आईने सम ज्ञान कैवल्य आपका
  • सूर्य सम तम हरो प्रभु पथ मोक्ष में आलोक हो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (१)
  • दो नेत्र नीरज आपके , टिमकार नहीं न लालिमा
  • अन्तर व बाहर निर्विकारी ,स्पष्ट ही ये झलकता
  • मुद्रा है पूर्ण ही शांत अरु अति ही विमल यह है प्रभो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (२)
  • ज्यों जाल आभा इन्द्र नमते मुकुट मणियों से बने
  • दो चरण पंकज आपके अति कान्ति युत आभा धरें
  • तिन स्मरण है नीर के सम ज्वाला भव दुःख शमन हो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (३)
  • भाव भक्ति प्रमोद युत मेंढक निकट तुम आ रहा
  • गुण गण समृद्ध जो स्वर्ग निधि को मात्र क्षण में पा गया
  • फ़िर क्या है अचरज भक्त सच्चे मुक्ति को न प्राप्त हों
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (४)
  • तन तप्त स्वर्ण समान आभा ज्ञान तन अन्तर धरें
  • है ज्ञान पट झलकन अनेकों ज्ञेय किंतु अखंड है
  • सिद्धार्थ सुत तदपि अजन्में राग रिक्त अचरज अहो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (५)
  • वाणी प्रभु गंगा की भांति लहर नय निर्मल अहो
  • जल ज्ञान है अगाध प्रभुवर लोक जन स्नान को
  • है आज भी वाणी से परिचित हंस सम बुधि धन्य हों
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (६)
  • वेग अनिर्वार जिसका तीन जग में छा रहा
  • निज आत्म बल से वय कुंवर में काम भट को वश किया
  • सो आप शक्ति अनंत राजें स्फुरित नित्यानंद हो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (७)
  • तुम वैद्य हो निरपेक्ष जग मोह से आरोग्य को
  • नि:स्वार्थ बंधु हो विदित महिमा है मंगल लोक को
  • उत्तम गुणों संयुक्त भव भयभीत साधूशरण हो
  • वीर प्रभो महावीर मेरे , नयन पथ गामी बनो (८)
  • (दोहा)
  • महावीराष्टक स्त्रोत यह ,भागचंद कविराज
  • रचा सुभक्ति उर सहित , हित जीवों के काज
  • जो पढता सुनता इसे , भक्ति ह्रदय में लाय
  • निश्चित ही भवि जीव वह , परम गति को पाय

Friday, 24 October 2008

हैरान दोहे

  • वित्त मंत्री की सीख है , धरें निवेशक धीर |
  • डूबे नित्य बाज़ार है , कौन सुनाएँ पीर ||
  • -
  • मंदी की इस रेस में , डॉलर क्यों मज़बूत |
  • बात समझ से दूर है, कैसा मंदी का भूत ||
  • -
  • स्वर्ण रजत सब खो रहे, नित्य चमक जो भाव |
  • कहाँ रुकेगा जाय कर , खोजो कछु उपाव ||
  • -
  • गर्व सफलता भेजकर, चंदा पर जो यान |
  • विश्व बॉस चिंता करे ,आगे क्यों हिन्दुस्तान ||
  • -
  • दिवाली इस बार की , ली घुंडी से हीन |
  • दिवाला इस पर्व पर , लक्षपति भये दीन ||
प्रदीप मानोरिया

Tuesday, 14 October 2008

हेंड वाश डे बनाम आदत या कहावत

  • कोई ना कोई तो ऐसी सूरत है
  • जिससे ये हेंड वाश जरूरत है
  • हाथ धोना सफाई की एक आदत है
  • हाथ धो कर पीछे पढ़ना एक कहावत है
  • भले लोगों में ये हो न हो हाथ धोने की आदत
  • किंतु चरितार्थ खूब होती है हाथ धोकर पीछे पड़ने की कहावत
  • मंदी शेयर बाज़ार के पीछे हाथ धोकर पडी है
  • मंहगाई भी हाथ धोकर आसमान पर जा चढी है
  • टिकिटअर्थी अपने आका के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं
  • जिन्हें नही मिलता वे बाहर हाथ मलते हुए खड़े हैं
  • गरीब के पीछे पडी है हाथ धोकर बीमारी
  • मंहगा इलाज़ मुश्किल कौन देखे विवशता और लाचारी
  • ग़रीब बाप की कन्या बैठी है आज भी कुंवारी
  • हाथ धोकर पीछे पडी है उसकी लाचारी
  • इधर प्रशासन हाथ धोकर पीछे पडा है हाथ धुलाने को
  • मास्टर लगा है अपनी जेब से साबुन तोलिया जुटाने को
  • सार्थकता इस दिन की है कि कुछ सीख जाएँ इस आदत को
  • वरना तो सब कुछ ही न्योछावर है इस कहावत को
रचना प्रदीप मानोरिया 15th अक्टूबर 2008

Monday, 13 October 2008

कलेंडर (Calendar)

  • विषय, वर्ग और आदतों को बढावा देने नए प्रकार का कलेंडर बुना
  • हर एक के दिवस को मनाने कोई न कोई दिन चुना 
  • इस प्रकार राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ये विभिन्न दिवस मनाये जाते है 
  • वे कभी शिक्षक दिवस, हास्य दिवस या मातृ दिवस कहलाते है 
  • किंतु यह बिडम्बना है आज की
  • अथवा खुमारी है समाज की 
  • अब स्वयं शिक्षक ही शिक्षक दिवस मनाता है 
  • स्वयं ही दरी जाजम और कुर्सी बिछाता है 
  • इन्जीनीर्यस ही इन्जीनीर्यस डे का करते हैं आयोजन 
  • एक मुख्य अतिथि कुछ जलपान या भोजन 
  • हास्य दिवस पर हंसने वाले इकठ्ठे हो जाते है
  • हंसने वालों को हंसने के फायदे समझाते हैं 
  • हिन्दी दिवस की भी भिन्न नही बीमारी है 
  • इसे मनाने की कलमकार की ही जिम्मेदारी है 
  • वे कलमकार श्रोताविहीन कक्ष में करते हैं विचार
  • परस्पर हिन्दी का दुखडा रोकर कर लेते हैं स्वल्पाहार  
  • गर ऐसा ही आलम रहा बरकरार 
  • सोता रहा समाज और ऊंघती रही सरकार 
  • तो फ़िर शहीद दिवस कैसे मनाया जायेगा ?
  • इसे मनाने क्या कोई शहीद यहाँ वापिस आयेगा ?  
  • रचना प्रदीप मनोरिया

Wednesday, 1 October 2008

हिन्दी का चिंतन

  • कहाँ खड़ी भाषा ये हिन्दी वह कितनी समृद्ध हुई
  • कितने पुरूष हैं भाषाप्रेमी कितनी महिलायें प्रबुद्ध हुई
  • खडा प्रश्न यह अनसुलझा सा और सदा ही खडा रहे
  • सृजन साहित्य का करने वाला और मनीषी यही कहे
  • चिंतन नहीं विषय का किंतु चिंता भाषा की बनी रहे
  • वक्ता लेखक तो बढ़ते जाते श्रोता पाठक की कमी रहे
  • तो भी करें आकलन इसका क्योंकि अवसर आया है
  • सब जानें हमने भी देखो हिन्दी दिवस मनाया है
  • साधन संचारों के फैले दुनिया मुठ्ठी में आयी है
  • इंटरनेट पर बन्धु देखो हिन्दी ने धूम मचाई है
  • प्रगति अरे हिन्दी भाषा की बिल गेट की बलिहारी है
  • सार्वभौम कर लिपि हिन्दी को जग के बीच उछारी है
  • गूगल जैसे महारथी से कार्य और आसान हुआ
  • इधर लिखा अगले क्षण में दुनिया को वह उपलब्ध हुआ
  • प्रिंट मीडिया से आगे यह नेट मीडिया जायेगा
  • हिन्दी का प्रचार हो व्यापक समृद्धि इसे दिलाएगा रचना प्रदीप मानोरिया
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