Wednesday, 29 September 2010

अयोध्या का फ़ैसला

मज़हब वतन में कोई मोहब्बत से बडा नहीं है
इश्क इंसानी से बढकर इबादत कोई नहीं है
सियासत के ठेकेदार लडाते मज़हब के नाम पर
है इश्क अगर दिल में बस बात ये सही है
क्या फ़ैसला जमीं ये है राम या अल्ला की
दिल को मिला ले उससे जिससे तेरी लगी है
बंदा तू राम का या अल्ला का बन्दा तू है
सांसे है वही तेरी लहू भी तेरा वही है
=प्रदीप मानोरिया

Thursday, 5 August 2010

हरियाली

गहरे और घने मेघों की सौगात धरा पर आई है
वन उपवन आँगन के गमले सब हरियाली छाई है
जहाँ अवनि पर कण माटी के बिछी पूर हरियाली है
और गगन पर रवि लोप है घटा खूब ही काली है
प्रदीप मानोरिया
चित्र साभार श्रीमति किरन नितिला राज पुरोहित

Wednesday, 4 August 2010

अथ पान महिमा

पान सो पदारथ सब जहान को सुधारत,
दिमाग को बढावत जामें चूना चौकसाई है ।
सुपारिन के साथ साथ मसाला मिले भांत भांत,
जामे कत्थे की रत्ती भर थोडी सी ललाई है ॥
बैठे हैं सभा मांहि बात करे भांत भांत,
थूकन जात बार बार जाने की बडाई है ।
कहें कवि किशोर दास चतुरन चतुराई साथ,
पान में तमाखू काऊ मूरख ने चलाई है ॥
रचयिता : किशोर दास खण्डवा वाले
प्रस्तुति : प्रदीप मानोरिया
साभार ; नई दुनिया इन्दौर

Sunday, 20 June 2010

दिल गीत और सुर

  • अफ़साने कुछ अनजाने से गीत पुराने लाया हूँ |
  • तेरी महफ़िल में बातों से लफ़्ज़ चुराने आया हूँ ||
  • लव खामोश और बन्द निगाहें स्याह अंधेरा छाया है |
  • तेरी सांसो की आवाज़ें सुर मैं मिलाने आया हूँ ||
  • खाली सागर फ़ैले पैमाने महफ़िल उजडी उजडी है |
  • बेसुध रिंदो के आलम में दो घूँट मैं पाने आया हूँ ||
  • रुत बरखा की मेघ दिखें न दिल धरती सा तपता है |
  • आँसू की दो बूँद बहा कर तपन मिटाने आया हूँ ||
  • दिल की चाहत दिल में रखकर वक्त बहुत अब बीत गया |
  • जीवन की संध्या में अब मैं याद दिलाने आया हूँ ||
=Pradeep Manoria 9425132060

Tuesday, 15 June 2010

मौन की पौन

  • आज अर्जुन दिख रहा क्यों कौरवों के वेश में ।
  • क्यों दिशा से रहित वायु बह रही इस देश में ॥
  • श्मसान सा भोपाल को जिनने बनाया था कभी ।
  • अब भी उनको पालते अर्जुन हमारे देश में ॥
  • कौन है जो डस गया और सपेरा कौन है।
  • हर कोई सच जानता अब हमारे देश में ॥
  • घट गया वह बुरा था सच उजागर आज है।
  • मौन कठपुतला रहा फ़िर भी हमारे देश में ॥
  • मौन वह है हाथ जिससे चल रही सब डोर है।
  • और बेटा मौन है नायक बना जो देश में ॥
  • लाशें कुचल कर कैसे भागा वो फ़िरंगी बेरहम ।
  • इसका उत्तर मांगती जनता हमारे देश में ॥ =प्रदीप मानोरिया

Tuesday, 18 May 2010

पानी रे पानी

  • पानी की कमी जो सर्वत्र ही छाई है ।
  • स्वंयसेवी संस्थायें चिंता से घबराई हैं ॥
  • एक संस्था ने पानी की बचत पर सेमिनार कराया ।
  • भांति भांति के लोगों को सुनने सुनाने बुलाया ॥
  • बहुत लोग माइक पाकर खुशी से फ़ूले ।
  • सुनाये जल बचत के अपने फ़ार्मूले ॥
  • एक बोले
  • बार बार गिलास धोने में पानी व्यर्थ बहता है ।
  • पानी पीने पूरे घर का गिलास एक रहता है ।
  • दूसरे बोले
  • हमने पानी बचाने का मस्त आइडिया अपनाया है ।
  • हम तो बोतल से जल पीते हैं गिलासों को ही हटाया है ।
  • तीसरे बोले
  • इतने से पानी बचाने से क्या होगा ।
  • बचत के लिये इतना तो करना होगा ।
  • कि हम तो कुछ इस तरह पानी बचाते हैं ।
  • खाट पर बैठ कर हम लोग नहाते हैं ।
  • खाट के नीचे जो पानी आता है ।
  • वो घर को धोने के काम आता है ।
  • मोहन लाल व्यर्थ की बातों से पक गये ।
  • जोश में आके कुछ ऐसा बहक गये ।
  • बोले
  • हम तो पानी की कमी में भी मस्त जीते हैं ।
  • आजकल शराब को हम नीट ही पीते हैं ।
  • एक डाक्टर ने सेहत के मुद्दे पर सवाल उठाया ।
  • बिना पानी के शराब पीने पर ऐतराज़ जताया ।
  • मोहनलाल ने तुरन्त खारिज़ किया ऐतराज़ ।
  • बोले सुनिये तो सही डाक्टर जनाब ।
  • बिना पानी के घूँट कब अन्दर जाता है ।
  • बोतल देख कर मुँह में पानी आ जाता है ।
प्रदीप मानोरिया

Sunday, 9 May 2010

माँ

  • ज़िन्दगी में जब कोई अवसाद आता है ।
  • माँ तेरी ममता का आँचल याद आता है ॥
  • वक्‍त है बीता बहुत तेरे बिन रह्ते हुये ।
  • किन्तु सर पे माँ तेरा ही हाथ आता है ॥
  • रहगुज़र में धूप भारी पर नहीं कुम्हला सका ।
  • साया ममता का सदा ही साथ आता है ।।
  • भूल हो जाये कोई फ़िर बोध हो अपराध का ।
  • डाँटना समझाना तेरा माँ याद आता है ॥
  • मेरे बच्चे खेलते जब उनकी माँ की गोद में ।
  • माँ मुझे बचपन मेरा भी याद आता है ॥
प्रदीप मानोरिया ०९४२५१३२०६०

Saturday, 27 February 2010

होली की हार्दिक शुभ कामनायें

पर्व ये होली ऐसी सजायें ।
.
प्रेम खुशी व प्यार लुटायें॥
.
जल है अमोलक इसे बचायें।
.
तिलक लगा त्यौहार मनायें ॥
=Pradeep Manoria
09425132060

Friday, 16 October 2009

शुभ दीपावली ..

दीपो की कतार से ,एकता औ प्यार से
उर के उल्लास से ,जीवन के प्रकाश से
खुशियाँ फैलाई हैं दीवाली आई है ....................
राम राज्य शान की , मुक्ति वर्धमान की
न्याय और नीति की ,अहिंसा की रीति की
याद ये दिलाई है दीवाली आई है ..................
इस प्रकाश पर्व पर , मन का सब तिमिर हर
हिंसा मन के रावण सब , विजय उन् पर पाकर अब
दीवाली मनाई है दीवाली आई है ................
शुभ दीपावली ..
(रचना = प्रदीप मानोरिया)

Thursday, 13 August 2009

swantrata diwas =pradeep manoria

गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
सभी मनाते पर्व देश का आज़ादी की वर्षगांठ है
वक्त है बीता धीरे धीरे साल द्वय और साठ है
बहे पवन परचम फहराता याद जिलाता जीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
जनता सोचे किंतु आज भी क्या वाकई आजाद हैं
भूले मानस को दिलवाते नेता इसकी याद हैं
मंहगाई की मारी जनता भूल गई ये जीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
हमने पाई थी आज़ादी लौट गए अँगरेज़ हैं
किंतु पीडा बंटवारे की दिल में अब भी तेज़ है
भाई हमारा हुआ पड़ोसी भूले सारी प्रीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
===प्रदीप मानोरिया
०९४२५१३२०६०

Friday, 3 July 2009

मिलने की प्यास रहने दे

  • ये जो गम हैं मेरे, मेरे ही पास रहने दे |
  • जिन्दगी में बाकी ये , जीने की आस रहने दे ||
  • वो मिले या न मिले , उल्फत की शमा जलती रहे |
  • न रहे साथ भले , यादें ही पास रहने दे ||
  • कतरा कतरा शराब में जिन्दगी शामिल है |
  • मय मयस्सर नहीं , महकती हुई सांस रहने दे ||
  • घूँट दो घूँट में साँसे तो महक जाती हैं |
  • जो नशे का है सबब साकी को पास रहने दे ||
  • स्याह जुल्फों के किनारे से टपकता पानी |
  • बूँद मोती सी ये अश्कों के साथ रहने दे ||
  • क्या है रुखसत का सबब कौन पूछे ,जाने |
  • वक़्त आने का कहो ,मिलने की प्यास रहने दे ||
  • ये जुदाई तेरी बर्दाश्त के काबिल न सही |
  • मेरी चाहत है तुझे , इतना ही भरम रहने दे ||
= प्रदीप मानोरिया
09425132060

Tuesday, 30 June 2009

सियासत

  • फिर वही राज वही काज वही मंहगाई है |
  • हिंद में कठपुतली ने फिर से कुर्सी पाई है ||
  • वही मेडम वही गुड्डा वही है डोर हाथों में |
  • फर्क इतना कि कुछ मजबूती हाथ आई है ||
  • हिंद में रेल समझोते से चली है अब तो |
  • या बिहारी या कि बंगाली ने इसे चलाई है ||
  • खुद पे ज्यादा भरोसा नहीं लाजिम मेरे दोस्त |
  • इस अति भरोसे में ही सांई ने मुंह की खाई है ||
  • बिल्ली खिसिया के नोचती है खम्बा |
  • बात ये ही है जिससे छिड़ी लड़ाई है ||
=Pradeep Manoria
चित्र vibhutipandya.blogspot.com से साभार

Friday, 26 June 2009

मोहब्बत - रूहानी ज़ज्बा

  • गुलशन में र वानी है , और रुत भी सुहानी है |
  • नहीं ज़ज्बा -ए-इश्क अगर ,फिर कैसी जवानी है ||
  • नहीं चैन कहीं मिलता , आँखे भी उनींदी हैं |
  • नज़रों में बसी सूरत ,ये इश्क निशानी है ||
  • आह्ट हो जरा कोई , आमद सी लगे उनकी |
  • नगमा ये मोहब्बत का, उल्फत की कहानी है ||
  • इज़हार मोहब्बत का , लफ्जों से लगे मुश्किल |
  • आँखों से ही कह देना , जो बात बतानी है ||
  • मिलना ही इश्क नहीं , उल्फत हो बिछड के भी |
  • हालात हों कोई भी , तेरी याद तो आनी है ||
  • भीगी सी हंसी जुल्फें , लहरा के चले जाना |
  • इनका ही सहारा है , खुसबू ही बसानी है ||
  • शम्मा ये मोहब्बत की , जो हमने जलाई है |
  • ये इश्क रहे ज़िंदा , ज़ज्बा ये रुहानी है ||
  • =प्रदीप मनोरिया
  • २६-०६-२००९
  • 09425132060

Tuesday, 23 June 2009

कब आओगे मेघ और फिर कब बरसोगे

  • राह तकत नयना थके, सतत जोहते बाट |
  • माह अषाढ़ भी जा रहा , नहीं आई बरसात ||
  • तपन नहीं अब सहन है , अब आये मानसून |
  • छींटे भी दुर्लभ हुए, बीत चला है जून ||
  • चार माह से कृपा बहुत , हे रवि तुमरा तेज़ |
  • रात हुए भी चुभत है , गरम गरम यह सेज ||
  • नहीं चैन दीखत कहीं , नहीं दीखते मेघ |
  • बिन बदरा बैचन सब , असह्य ग्रीष्म का वेग ||
  • शासन में भी उलझ रहा , अबकी ऐसा पेंच |
  • बिजली पानी की कमी , मानसून की खेंच ||
  • मेघ राज सुन लीजिये , हमरी करुण पुकार |
  • अब तो दर्शन दीजिये ,सुगम चले सरकार ||
  • =Pradeep Manoria

Sunday, 21 June 2009

पिताजी - एक श्रद्धांजलि

  • अपनो के विछोह से |
  • बंधे जिनके मोह से |
  • उनके अवसान से |
  • जीव के प्रयाण से |
  • दुख की गहराई है |
  • याद बहुत आई है |
  • जितना मैं भुलाता हूँ |
  • भूल नहीं पाता हूँ |
  • मुझ पे उनका साया था |
  • हाथों से मुझे खिलाया था |
  • धूप में कुम्हलाता हूँ |
  • कुछ सोच नहीं पाता हूँ |
  • कैसे अब जी पाऊँगा |
  • नहीं भुला पाऊँगा |
  • नहीं भुला पाऊँगा, नहीं भुला पाऊँगा |
=प्रदीप मानोरिया

Friday, 10 April 2009

सपनों का मौसम -- सन्दर्भ : लो.स.चुनाव२००९

  • पूरे देश में फसल स्वप्न की कैसी यह हरियाई है | 
  • दिवस हजारों बीते देखो याद हमारी आई है ||
  • पूर्ण देश में सपनों के विक्रेता ऐसे घूम रहे | 
  • गाँव गली में घूम घूम कर बूढे बच्चों को चूम रहे ||
  • कोई क़र्ज़ माफी के सपने ,सपने बिजली पानी के | 
  • कन्या की शादी के सपने .सस्ते चावल धानी के ||
  • नेता अब विपणन में माहिर स्वप्न सुनहरे दिखा रहा | 
  • भोला वोटर इन सपनो को निज मन में है सजा रहा ||
  • मिलने दलित अरे सांसद से , भूखा सड़क पर रहा पडा | 
  • आज उसी के घर के आगे ,नेता का वाहन आय खडा ||
  • अरे गाँव को लौटा भूखा , किन्तु नहीं मिलने पाया | 
  • आज उसी के घर में ,नेता ने भोजन खाया ||
  • फिर अखवार में फोटो अपना देख बेचारा भरमाया |
  • कष्ट पुराने विस्मृत सारे , नेता चरण शरण आया ||
  • ठगा गया वोटर ही सदा से , अपना अधिकार लुटाता है | 
  • नेता मिथ्या स्वप्न बेचकर , अपना व्यापार चलाता है ||
= प्रदीप मानोरिया 094 251 32060
photo courtsey google photo search

Tuesday, 7 April 2009

जरनैल का जूता

ज से जूता, ज से जैदी, ज से ही जरनैल है | 
वैश्विक यह संस्कृति हमारी कितना सुन्दर मेल है ||
कलम नवीसी कलम सिपाही दोनों ही पत्रकार हैं |
छोड़ कलम को आज बनाया जूते को हथियार है ||
अंतर ह्रदय ज्वालामुखी कैसा, कैसा ऐसा क्रोध है | 
स्याही सूखीआज कलम की या विरोध नव शोध है ||
सत्याग्रह से  बात चली जूते तक यह आई है |
नव विकास की नव धारा यह अर्पित लाख दुहाई है ||  
रचना प्रदीप मनोरिया ०९४२५१३२०६०

Monday, 6 April 2009

महावीर जयंती

  • वीर प्रभु की जन्म जयन्ति देती यह संदेश है / 
  • जीव सभी हैं शुध्द सिध्द सम पर का नहीं प्रवेश है / 
  • देह धार अंतिम ये अलौलिक घटना मंगलकार है / 
  • सच्चे सुख का मार्ग दिखाने लिया प्रभु अवतार है /
  • भिन्न भिन्न हैं वस्तु जगत में नित रह कर पर्याय धरें / 
  • अपनी अपनी मर्यादा में उपज विनश निर्वाह करें / 
  • नहीं आधीन किसी के कोई शुध्द स्वाधीन व्यवस्था है / 
  • योग्य अवस्था ही उपजेगी विनशे पूर्व अवस्था है / 
  • इन्द्र नरेन्द्र जिनेन्द्र भी नाहीं शक्ति ऐसी रखते हैं / 
  • पलट सकें पर्यायों का क्रम नही सामर्थ्य को धरते हैं / 
  • जीव स्वंय परिणमित है होता क्रम नियमित परिणामों से / 
  • नहीं अजीव कदापि होवे सुरभित शक्ति निधानों से / 
  • जैन धर्म का सार यही है यही समय का सार है / 
  • निज में निज को लखने वाले निश्चित बेडा पार है / 
  • सित तैरस थी चैत माह की यही दिवस था पर्व यही / 
  • गुरू कहान ने था अपनाया जिन शासन ये गर्वमयी /
  • मुक्ति मार्ग को कर आलोकित किया सरल सब काज है / 
  • हम भी निज को निज में देखें मिला ये अवसर आज है / 
        रचना प्रदीप मानोरिया

Wednesday, 4 March 2009

फागुन की बहार - Pradeep Manoria

फागुन आयो फागुन आयो फागुन आयो रे |
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे ||
गोपी नृत्य दृश्य कटि दौलन संग गिरधारी रे |
प्रेम नयन के तीर हैं तीखे, कर पिचकारी रे ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
जाता जाड़ा ग्रीष्म की आमद लागे प्यारी रे |
धुप सुनहरी स्पर्श सुखद जब भीगे सारी रे ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
टेसू ने वन उपवन पूरे  छठा गुलाबी रे |
मौसम का है नशा निराला , नयन शराबी रे ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
चूनर भीगी अंगिया भीगी , कांच हुयी अब सारी रे |
कृष्ण कुंवर पीताम्बर छीना , राधा मतवारी रे  ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
वंशी ले नटवर जा बैठे तान सुहानी रे |
झूमें गोपिन संग राधा के होकर दीवानी रे ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
सुख स्पर्शन रंग माध्यम होली आई रे |
झूमें नाचें पकड़ लें बैंयां कुंवर कन्हाई रे |
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ........
= Pradeep Manoria 
09425132060