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Friday, 16 October 2009

शुभ दीपावली ..

दीपो की कतार से ,एकता औ प्यार से
उर के उल्लास से ,जीवन के प्रकाश से
खुशियाँ फैलाई हैं दीवाली आई है ....................
राम राज्य शान की , मुक्ति वर्धमान की
न्याय और नीति की ,अहिंसा की रीति की
याद ये दिलाई है दीवाली आई है ..................
इस प्रकाश पर्व पर , मन का सब तिमिर हर
हिंसा मन के रावण सब , विजय उन् पर पाकर अब
दीवाली मनाई है दीवाली आई है ................
शुभ दीपावली ..
(रचना = प्रदीप मानोरिया)

Saturday, 22 November 2008

ज्योति = Pradeep Manoria

एक दिया जीवन का ज्योतिर्मय /
पलते पढते बढते जलता रहा / 
तीन दशक से कुछ ज्यादा / 
जीवन पथ पर हुआ अनुबन्धित विवाह संस्था में /
दो नन्ही ज्योति और हुई प्रस्फ़ुटित /
चलता रहा जीवन घडी के पेन्डुलम के साथ /
परिजन पुरजन का प्रेम ले आया पीहर तक /
मेल, मिलाप ,प्रेम ,ताने ,मिलने के बहाने /
अचानक फ़डफ़डाई और ज्योति बुझ गई /
देखते रहे वो ही परिजन दिये की ज्योति का बुझ जाना /
दो नन्ही ज्योति इस ख्याल से गुम /
मुख्य ज्योति के विलय से ऑंखे नम /
चेतनज्योति गई फ़िर किसी दिये में / 
उसी धारा में नये दिये की ओर /
दिखता नहीं संसार का कोई छोर / 
वह ज्योति जाते हुये छोड गई इक सवाल /
ढूंढना होगा हमॆं हल , क्या है संसार का सार ?
जाननी होगी हमें संसार की वास्तविकता /
क्या है हमारा स्वरूप कौन हैं हम ?
कब रूकेगा ये सिलसिला ?
चेतन अविनश्वर तत्व 
क्यों इस नश्वर देह की गुलामी में फ़ंसे है ?
प्रदीप मानोरिया 09425132060