Thursday, 31 March 2011
Tuesday, 29 March 2011
Friday, 18 March 2011
होली की धूम
रंग की फुहार है , गीत की बहार है /
बॉंटता जो प्यार है , होली का त्यौहार है /
धूम ही मचायेंगे , होली यूं मनायेंगे /
यारों की टोली में , गॉंव की होलीमें /
हाथों में रंग लिये , पिचकारी संग लिये /
झूमझूम गायेंगे . होली यूं मनायेंगे /
गॉंव की जो गोरियॉं , भाभी और छोरियां /
देख रंग हाथों में , घुस गई अहातों में /
दरवज्जा तुडवायेंगे , होली यूं मनायेंगे /
रंग लगा गालों में , भर अबीर बालों में /
बीती बात भूल गये, हम गले से झूल रहे /
भेद सब मिटायेंगे ,होली यूं मनायेंगे /
पंहुचे नदी के घाट पर , भंगिया को बॉंट कर /
छान कर डटाई है , मस्ती खूब छाई है /
गीत गुनगुनायेंगे ,होली यूं मनायेंगे /
कधे पर शर्ट टॉंग , धर के विचित्र स्वांग /
होंठों पर गीत फाग . ढपली पर बजे राग /
तुमको नचवायेंगे , होली यूं मनायेंगे /
बाटी और दाल है , चूरमा कमाल है /
पत्तों की थाली है , गंध भी मतवाली है /
डट के खूब खायेंगे , होली यूं मनायेंगे /
रंग की फुहार है , गीत की बहार है /
बॉंटता जो प्यार है , होली का त्यौहार है /
धूम ही मचायेंगे , होली यूं मनायेंगे /
== प्रदीप मानोरिया 09425132060
Thursday, 17 February 2011
manmohan singh : 21st century's Dhritrashtra
राष्ट्र का गौरव बडा है या कि यह दुर्भाग्य है ।
ताज पहने आज भी बैठा हुआ धृतराष्ट्र है ॥
इटेलियन संजय हुई या गांधारी कौन है ।
इसके जबाब में जनता रही क्यों मौन है ॥
कृष्ण ने रक्षा करी थी द्रोपदी की लाज की ।कौन अब रक्षा करेगा ये द्रोपदी(*) जो आज की ॥
(*) द्रोपदी= जनता,देश
प्रदीप मानोरिया
ताज पहने आज भी बैठा हुआ धृतराष्ट्र है ॥
इटेलियन संजय हुई या गांधारी कौन है ।
इसके जबाब में जनता रही क्यों मौन है ॥
कृष्ण ने रक्षा करी थी द्रोपदी की लाज की ।कौन अब रक्षा करेगा ये द्रोपदी(*) जो आज की ॥
(*) द्रोपदी= जनता,देश
प्रदीप मानोरिया
Thursday, 13 January 2011
Friday, 5 November 2010
मंगलमय दीपावली
समर्थ दीपक ज्योति है चिर काल का हर ले तिमिर ।
हो उदित अब ज्ञान ज्योति हर सके जग का भंवर ॥
निर्वाण श्री प्रभु वीर का यह दे रहा संदेश है ।
समृद्ध हो निज ज्ञान वैभव लक्ष्मी बसी निज देश है ॥
मंगलमय दीपावली
==========
प्रदीप मानोरिया
Thursday, 14 October 2010
global handwash day
- कोई ना कोई तो ऐसी सूरत है
- जिससे ये हेंड वाश जरूरत है
- हाथ धोना सफाई की एक आदत है
- हाथ धो कर पीछे पढ़ना एक कहावत है
- भले लोगों में ये हो न हो हाथ धोने की आदत
- किंतु चरितार्थ खूब होती है हाथ धोकर पीछे पड़ने की कहावत
- मंदी शेयर बाज़ार के पीछे हाथ धोकर पडी है
- मंहगाई भी हाथ धोकर आसमान पर जा चढी है
- टिकिटअर्थी अपने आका के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं
- जिन्हें नही मिलता वे बाहर हाथ मलते हुए खड़े हैं
- गरीब के पीछे पडी है हाथ धोकर बीमारी
- मंहगा इलाज़ मुश्किल कौन देखे विवशता और लाचारी
- ग़रीब बाप की कन्या बैठी है आज भी कुंवारी
- हाथ धोकर पीछे पडी है उसकी लाचारी
- इधर प्रशासन हाथ धोकर पीछे पडा है हाथ धुलाने को
- मास्टर लगा है अपनी जेब से साबुन तोलिया जुटाने को
- सार्थकता इस दिन की है कि कुछ सीख जाएँ इस आदत को
- वरना तो सब कुछ ही न्योछावर है इस कहावत को
रचना प्रदीप मानोरिया 15th अक्टूबर 2008
Friday, 1 October 2010
Wednesday, 29 September 2010
अयोध्या का फ़ैसला

मज़हब वतन में कोई मोहब्बत से बडा नहीं है
इश्क इंसानी से बढकर इबादत कोई नहीं है
सियासत के ठेकेदार लडाते मज़हब के नाम पर
है इश्क अगर दिल में बस बात ये सही है
क्या फ़ैसला जमीं ये है राम या अल्ला की
दिल को मिला ले उससे जिससे तेरी लगी है
बंदा तू राम का या अल्ला का बन्दा तू है
सांसे है वही तेरी लहू भी तेरा वही है
=प्रदीप मानोरिया
Thursday, 5 August 2010
हरियाली
गहरे और घने मेघों की सौगात धरा पर आई है
जहाँ अवनि पर कण माटी के बिछी पूर हरियाली है
और गगन पर रवि लोप है घटा खूब ही काली है
प्रदीप मानोरिया
चित्र साभार श्रीमति किरन नितिला राज पुरोहित
Wednesday, 4 August 2010
अथ पान महिमा
पान सो पदारथ सब जहान को सुधारत,
दिमाग को बढावत जामें चूना चौकसाई है ।
सुपारिन के साथ साथ मसाला मिले भांत भांत,
जामे कत्थे की रत्ती भर थोडी सी ललाई है ॥
बैठे हैं सभा मांहि बात करे भांत भांत,
थूकन जात बार बार जाने की बडाई है ।
कहें कवि किशोर दास चतुरन चतुराई साथ,
पान में तमाखू काऊ मूरख ने चलाई है ॥
रचयिता : किशोर दास खण्डवा वाले
प्रस्तुति : प्रदीप मानोरिया
साभार ; नई दुनिया इन्दौर
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Sunday, 27 June 2010
Sunday, 20 June 2010
दिल गीत और सुर
- अफ़साने कुछ अनजाने से गीत पुराने लाया हूँ |
- तेरी महफ़िल में बातों से लफ़्ज़ चुराने आया हूँ ||
- लव खामोश और बन्द निगाहें स्याह अंधेरा छाया है |
- तेरी सांसो की आवाज़ें सुर मैं मिलाने आया हूँ ||
- खाली सागर फ़ैले पैमाने महफ़िल उजडी उजडी है |
- बेसुध रिंदो के आलम में दो घूँट मैं पाने आया हूँ ||
- रुत बरखा की मेघ दिखें न दिल धरती सा तपता है |
- आँसू की दो बूँद बहा कर तपन मिटाने आया हूँ ||
- दिल की चाहत दिल में रखकर वक्त बहुत अब बीत गया |
- जीवन की संध्या में अब मैं याद दिलाने आया हूँ ||
=Pradeep Manoria 9425132060
Tuesday, 15 June 2010
मौन की पौन

- आज अर्जुन दिख रहा क्यों कौरवों के वेश में ।
- क्यों दिशा से रहित वायु बह रही इस देश में ॥
- श्मसान सा भोपाल को जिनने बनाया था कभी ।
- अब भी उनको पालते अर्जुन हमारे देश में ॥
- कौन है जो डस गया और सपेरा कौन है।
- हर कोई सच जानता अब हमारे देश में ॥
- घट गया वह बुरा था सच उजागर आज है।
- मौन कठपुतला रहा फ़िर भी हमारे देश में ॥
- मौन वह है हाथ जिससे चल रही सब डोर है।
- और बेटा मौन है नायक बना जो देश में ॥
- लाशें कुचल कर कैसे भागा वो फ़िरंगी बेरहम ।
- इसका उत्तर मांगती जनता हमारे देश में ॥ =प्रदीप मानोरिया
Tuesday, 18 May 2010
पानी रे पानी
- पानी की कमी जो सर्वत्र ही छाई है ।
- स्वंयसेवी संस्थायें चिंता से घबराई हैं ॥
- एक संस्था ने पानी की बचत पर सेमिनार कराया ।
- भांति भांति के लोगों को सुनने सुनाने बुलाया ॥
- बहुत लोग माइक पाकर खुशी से फ़ूले ।
- सुनाये जल बचत के अपने फ़ार्मूले ॥
- एक बोले
- बार बार गिलास धोने में पानी व्यर्थ बहता है ।
- पानी पीने पूरे घर का गिलास एक रहता है ।
- दूसरे बोले
- हमने पानी बचाने का मस्त आइडिया अपनाया है ।
- हम तो बोतल से जल पीते हैं गिलासों को ही हटाया है ।
- तीसरे बोले
- इतने से पानी बचाने से क्या होगा ।
- बचत के लिये इतना तो करना होगा ।
- कि हम तो कुछ इस तरह पानी बचाते हैं ।
- खाट पर बैठ कर हम लोग नहाते हैं ।
- खाट के नीचे जो पानी आता है ।
- वो घर को धोने के काम आता है ।
- मोहन लाल व्यर्थ की बातों से पक गये ।
- जोश में आके कुछ ऐसा बहक गये ।
- बोले
- हम तो पानी की कमी में भी मस्त जीते हैं ।
- आजकल शराब को हम नीट ही पीते हैं ।
- एक डाक्टर ने सेहत के मुद्दे पर सवाल उठाया ।
- बिना पानी के शराब पीने पर ऐतराज़ जताया ।
- मोहनलाल ने तुरन्त खारिज़ किया ऐतराज़ ।
- बोले सुनिये तो सही डाक्टर जनाब ।
- बिना पानी के घूँट कब अन्दर जाता है ।
- बोतल देख कर मुँह में पानी आ जाता है ।
Sunday, 9 May 2010
माँ
- ज़िन्दगी में जब कोई अवसाद आता है ।
- माँ तेरी ममता का आँचल याद आता है ॥
- वक्त है बीता बहुत तेरे बिन रह्ते हुये ।
- किन्तु सर पे माँ तेरा ही हाथ आता है ॥
- रहगुज़र में धूप भारी पर नहीं कुम्हला सका ।
- साया ममता का सदा ही साथ आता है ।।
- भूल हो जाये कोई फ़िर बोध हो अपराध का ।
- डाँटना समझाना तेरा माँ याद आता है ॥
- मेरे बच्चे खेलते जब उनकी माँ की गोद में ।
- माँ मुझे बचपन मेरा भी याद आता है ॥
Saturday, 27 February 2010
होली की हार्दिक शुभ कामनायें
पर्व ये होली ऐसी सजायें ।
.
प्रेम खुशी व प्यार लुटायें॥
.
जल है अमोलक इसे बचायें।
.
तिलक लगा त्यौहार मनायें ॥
=Pradeep Manoria
09425132060
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Friday, 16 October 2009
शुभ दीपावली ..
दीपो की कतार से ,एकता औ प्यार से
उर के उल्लास से ,जीवन के प्रकाश से
खुशियाँ फैलाई हैं दीवाली आई है ....................
राम राज्य शान की , मुक्ति वर्धमान की
न्याय और नीति की ,अहिंसा की रीति की
याद ये दिलाई है दीवाली आई है ..................
इस प्रकाश पर्व पर , मन का सब तिमिर हर
हिंसा मन के रावण सब , विजय उन् पर पाकर अब
दीवाली मनाई है दीवाली आई है ................
शुभ दीपावली ..
(रचना = प्रदीप मानोरिया)
Thursday, 13 August 2009
swantrata diwas =pradeep manoria
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
सभी मनाते पर्व देश का आज़ादी की वर्षगांठ है
वक्त है बीता धीरे धीरे साल द्वय और साठ है
बहे पवन परचम फहराता याद जिलाता जीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
जनता सोचे किंतु आज भी क्या वाकई आजाद हैं
भूले मानस को दिलवाते नेता इसकी याद हैं
मंहगाई की मारी जनता भूल गई ये जीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
हमने पाई थी आज़ादी लौट गए अँगरेज़ हैं
किंतु पीडा बंटवारे की दिल में अब भी तेज़ है
भाई हमारा हुआ पड़ोसी भूले सारी प्रीत रे
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे
===प्रदीप मानोरिया
०९४२५१३२०६०
Friday, 3 July 2009
मिलने की प्यास रहने दे
- ये जो गम हैं मेरे, मेरे ही पास रहने दे |
- जिन्दगी में बाकी ये , जीने की आस रहने दे ||
- वो मिले या न मिले , उल्फत की शमा जलती रहे |
- न रहे साथ भले , यादें ही पास रहने दे ||
- कतरा कतरा शराब में जिन्दगी शामिल है |
- मय मयस्सर नहीं , महकती हुई सांस रहने दे ||
- घूँट दो घूँट में साँसे तो महक जाती हैं |
- जो नशे का है सबब साकी को पास रहने दे ||
- स्याह जुल्फों के किनारे से टपकता पानी |
- बूँद मोती सी ये अश्कों के साथ रहने दे ||
- क्या है रुखसत का सबब कौन पूछे ,जाने |
- वक़्त आने का कहो ,मिलने की प्यास रहने दे ||
- ये जुदाई तेरी बर्दाश्त के काबिल न सही |
- मेरी चाहत है तुझे , इतना ही भरम रहने दे ||
= प्रदीप मानोरिया
09425132060
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