Tuesday, 30 June 2009

सियासत

  • फिर वही राज वही काज वही मंहगाई है |
  • हिंद में कठपुतली ने फिर से कुर्सी पाई है ||
  • वही मेडम वही गुड्डा वही है डोर हाथों में |
  • फर्क इतना कि कुछ मजबूती हाथ आई है ||
  • हिंद में रेल समझोते से चली है अब तो |
  • या बिहारी या कि बंगाली ने इसे चलाई है ||
  • खुद पे ज्यादा भरोसा नहीं लाजिम मेरे दोस्त |
  • इस अति भरोसे में ही सांई ने मुंह की खाई है ||
  • बिल्ली खिसिया के नोचती है खम्बा |
  • बात ये ही है जिससे छिड़ी लड़ाई है ||
=Pradeep Manoria
चित्र vibhutipandya.blogspot.com से साभार

Friday, 26 June 2009

मोहब्बत - रूहानी ज़ज्बा

  • गुलशन में र वानी है , और रुत भी सुहानी है |
  • नहीं ज़ज्बा -ए-इश्क अगर ,फिर कैसी जवानी है ||
  • नहीं चैन कहीं मिलता , आँखे भी उनींदी हैं |
  • नज़रों में बसी सूरत ,ये इश्क निशानी है ||
  • आह्ट हो जरा कोई , आमद सी लगे उनकी |
  • नगमा ये मोहब्बत का, उल्फत की कहानी है ||
  • इज़हार मोहब्बत का , लफ्जों से लगे मुश्किल |
  • आँखों से ही कह देना , जो बात बतानी है ||
  • मिलना ही इश्क नहीं , उल्फत हो बिछड के भी |
  • हालात हों कोई भी , तेरी याद तो आनी है ||
  • भीगी सी हंसी जुल्फें , लहरा के चले जाना |
  • इनका ही सहारा है , खुसबू ही बसानी है ||
  • शम्मा ये मोहब्बत की , जो हमने जलाई है |
  • ये इश्क रहे ज़िंदा , ज़ज्बा ये रुहानी है ||
  • =प्रदीप मनोरिया
  • २६-०६-२००९
  • 09425132060

Tuesday, 23 June 2009

कब आओगे मेघ और फिर कब बरसोगे

  • राह तकत नयना थके, सतत जोहते बाट |
  • माह अषाढ़ भी जा रहा , नहीं आई बरसात ||
  • तपन नहीं अब सहन है , अब आये मानसून |
  • छींटे भी दुर्लभ हुए, बीत चला है जून ||
  • चार माह से कृपा बहुत , हे रवि तुमरा तेज़ |
  • रात हुए भी चुभत है , गरम गरम यह सेज ||
  • नहीं चैन दीखत कहीं , नहीं दीखते मेघ |
  • बिन बदरा बैचन सब , असह्य ग्रीष्म का वेग ||
  • शासन में भी उलझ रहा , अबकी ऐसा पेंच |
  • बिजली पानी की कमी , मानसून की खेंच ||
  • मेघ राज सुन लीजिये , हमरी करुण पुकार |
  • अब तो दर्शन दीजिये ,सुगम चले सरकार ||
  • =Pradeep Manoria

Sunday, 21 June 2009

पिताजी - एक श्रद्धांजलि

  • अपनो के विछोह से |
  • बंधे जिनके मोह से |
  • उनके अवसान से |
  • जीव के प्रयाण से |
  • दुख की गहराई है |
  • याद बहुत आई है |
  • जितना मैं भुलाता हूँ |
  • भूल नहीं पाता हूँ |
  • मुझ पे उनका साया था |
  • हाथों से मुझे खिलाया था |
  • धूप में कुम्हलाता हूँ |
  • कुछ सोच नहीं पाता हूँ |
  • कैसे अब जी पाऊँगा |
  • नहीं भुला पाऊँगा |
  • नहीं भुला पाऊँगा, नहीं भुला पाऊँगा |
=प्रदीप मानोरिया

Friday, 10 April 2009

सपनों का मौसम -- सन्दर्भ : लो.स.चुनाव२००९

  • पूरे देश में फसल स्वप्न की कैसी यह हरियाई है | 
  • दिवस हजारों बीते देखो याद हमारी आई है ||
  • पूर्ण देश में सपनों के विक्रेता ऐसे घूम रहे | 
  • गाँव गली में घूम घूम कर बूढे बच्चों को चूम रहे ||
  • कोई क़र्ज़ माफी के सपने ,सपने बिजली पानी के | 
  • कन्या की शादी के सपने .सस्ते चावल धानी के ||
  • नेता अब विपणन में माहिर स्वप्न सुनहरे दिखा रहा | 
  • भोला वोटर इन सपनो को निज मन में है सजा रहा ||
  • मिलने दलित अरे सांसद से , भूखा सड़क पर रहा पडा | 
  • आज उसी के घर के आगे ,नेता का वाहन आय खडा ||
  • अरे गाँव को लौटा भूखा , किन्तु नहीं मिलने पाया | 
  • आज उसी के घर में ,नेता ने भोजन खाया ||
  • फिर अखवार में फोटो अपना देख बेचारा भरमाया |
  • कष्ट पुराने विस्मृत सारे , नेता चरण शरण आया ||
  • ठगा गया वोटर ही सदा से , अपना अधिकार लुटाता है | 
  • नेता मिथ्या स्वप्न बेचकर , अपना व्यापार चलाता है ||
= प्रदीप मानोरिया 094 251 32060
photo courtsey google photo search

Tuesday, 7 April 2009

जरनैल का जूता

ज से जूता, ज से जैदी, ज से ही जरनैल है | 
वैश्विक यह संस्कृति हमारी कितना सुन्दर मेल है ||
कलम नवीसी कलम सिपाही दोनों ही पत्रकार हैं |
छोड़ कलम को आज बनाया जूते को हथियार है ||
अंतर ह्रदय ज्वालामुखी कैसा, कैसा ऐसा क्रोध है | 
स्याही सूखीआज कलम की या विरोध नव शोध है ||
सत्याग्रह से  बात चली जूते तक यह आई है |
नव विकास की नव धारा यह अर्पित लाख दुहाई है ||  
रचना प्रदीप मनोरिया ०९४२५१३२०६०

Monday, 6 April 2009

महावीर जयंती

  • वीर प्रभु की जन्म जयन्ति देती यह संदेश है / 
  • जीव सभी हैं शुध्द सिध्द सम पर का नहीं प्रवेश है / 
  • देह धार अंतिम ये अलौलिक घटना मंगलकार है / 
  • सच्चे सुख का मार्ग दिखाने लिया प्रभु अवतार है /
  • भिन्न भिन्न हैं वस्तु जगत में नित रह कर पर्याय धरें / 
  • अपनी अपनी मर्यादा में उपज विनश निर्वाह करें / 
  • नहीं आधीन किसी के कोई शुध्द स्वाधीन व्यवस्था है / 
  • योग्य अवस्था ही उपजेगी विनशे पूर्व अवस्था है / 
  • इन्द्र नरेन्द्र जिनेन्द्र भी नाहीं शक्ति ऐसी रखते हैं / 
  • पलट सकें पर्यायों का क्रम नही सामर्थ्य को धरते हैं / 
  • जीव स्वंय परिणमित है होता क्रम नियमित परिणामों से / 
  • नहीं अजीव कदापि होवे सुरभित शक्ति निधानों से / 
  • जैन धर्म का सार यही है यही समय का सार है / 
  • निज में निज को लखने वाले निश्चित बेडा पार है / 
  • सित तैरस थी चैत माह की यही दिवस था पर्व यही / 
  • गुरू कहान ने था अपनाया जिन शासन ये गर्वमयी /
  • मुक्ति मार्ग को कर आलोकित किया सरल सब काज है / 
  • हम भी निज को निज में देखें मिला ये अवसर आज है / 
        रचना प्रदीप मानोरिया

Wednesday, 4 March 2009

फागुन की बहार - Pradeep Manoria

फागुन आयो फागुन आयो फागुन आयो रे |
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे ||
गोपी नृत्य दृश्य कटि दौलन संग गिरधारी रे |
प्रेम नयन के तीर हैं तीखे, कर पिचकारी रे ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
जाता जाड़ा ग्रीष्म की आमद लागे प्यारी रे |
धुप सुनहरी स्पर्श सुखद जब भीगे सारी रे ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
टेसू ने वन उपवन पूरे  छठा गुलाबी रे |
मौसम का है नशा निराला , नयन शराबी रे ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
चूनर भीगी अंगिया भीगी , कांच हुयी अब सारी रे |
कृष्ण कुंवर पीताम्बर छीना , राधा मतवारी रे  ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
वंशी ले नटवर जा बैठे तान सुहानी रे |
झूमें गोपिन संग राधा के होकर दीवानी रे ||
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ...........
सुख स्पर्शन रंग माध्यम होली आई रे |
झूमें नाचें पकड़ लें बैंयां कुंवर कन्हाई रे |
बरसे रंग अबीर गुलाल गगन में फागुन आयो रे 
फागुन आयो फागुन आयो ........
= Pradeep Manoria 
09425132060

Saturday, 28 February 2009

होली और चुनाव की कॉकटेल

अब के आयो एइसों फाग रेवडी बँट रही चारों ओर |
जाको ओर छोर न दीखे ,बाँटो बाँटो का शोर ||  
कोई वेतन वृद्धि देता कोई टेक्स में छूट | 
जनता का वे माल लुटा कर वोट रहे हैं लूट ||  
अब के आयो एइसों फाग रेवडी बँट रही चारों ओर |  
दुनिया जूझ रही संकट से , यहाँ भरी भर पूर | 
वोटों के लालच में नेता , हुए नशे में चूर || 
अब के आयो एइसों फाग रेवडी बँट रही चारों ओर |
सेवा कर कम करदिया , बढ़ गया वेतनमान | 
कहीं क़र्ज़ माफी हुयी , हुया देश कल्याण || 
अब के आयो एइसों फाग रेवडी बँट रही चारों ओर |
= Pradeep Manoria 

Thursday, 19 February 2009

सुख ?

  • बीत रहा जीवन यूँ ही , 
  • बस सुख की अभिलाषा | 
  • सुख है दुख या फ़िर सुख ,
  • अनभिज्ञ रहा क्या परिभाषा || 
  • तीव्र आकुलित भोक्ता दुःख का , 
  • कम आकुलता क्या यह है सुख ?
  • जग भर जिसको सुख कहता है , 
  • वह सुख है अथवा है दुःख ?  
  • निर्विचार जीवन जीता है , 
  • रत रह व्यर्थ प्रयासों में |
  • सुख की कर कर असत कल्पना ,
  • खुश है सुख आभासों में || 
  • सुख आभासों को सुख कहना ही 
  • उपचारित जग का व्यवहार | 
  • किंतु असलियत क्या है इसकी , 
  • है आवश्यक तनिक विचार ||  
  • भोगी वेदना जब ही प्यास की ,
  • सुखमय तृप्ति देता पानी | 
  • भूख वेदना सहने पर ही 
  • सुस्वादु भोजन सुखदानी || 
  • बिस्तर का संयोग सुखद हो , 
  • जब थकान से व्यथित हुआ |
  • यौन रमण की पीडा बिन तो , 
  • यौन रमण न सफल हुआ ||  
  • पीडा से होकर व्याकुल फ़िर ,
  • जो संयोगों को भोग लिया | 
  • आकुलता की कमी क्षणिक है , 
  • उसको ही सुख मान लिया || 
  • सुखाभास यह न यथार्थ सुख ,
  • पीडा को कम कर देता |
  • पहले पीड़ित होकर प्राणी , 
  • उसको ही सुख कह लेता || 
  • भोगों के साधन पाकर फ़िर ,
  • भोगूं भोगूं आकुलता है | 
  • इसको फ़िर सुख कैसे कह दें , 
  • सुख कहना मूरखता है || 
  • फलित यही होता है अब जो , 
  • इन्द्रिय से भोगे जाते |
  • वे सुख न है वे दुःख के साधन , 
  • जग में सुख वे कहलाते ||  
  • जो इन्द्रिय से पार भोगना ,
  • निज आतम सुख का सागर | 
  • पर से नज़र हटा अन्तर में ,
  • देख लबालब सुख गागर ||
  • नहीं वेदना पीडा कोई , 
  • आकुलता का काम नहीं |
  • है आनंद अनंत अन्दर में ,
  • मात्र निराकुल धाम यही ||
=प्रदीप मानोरिया 09125132060

Tuesday, 3 February 2009

टी वी न्यूज चैनल

  • टी वी न्यूज चैनल की कलाकारी है / 
  • टी आर पी का भूत इन पर तारी है / 
  • सनसनी वारदात जैसे कार्यक्रम / 
  • पैदा करते वीभत्सता डर और भ्रम / 
  • समाज की जागरूकता के नाम पर दे रहे नालेज / 
  • वास्तव में बन गये हैं अपराध सिखाने के कालेज / 
  • हमें समाज को जगाना है ये तो इक बहाना है / 
  • इन्हैं तो अपराध करना सिखाना है / 
  • आपराधिक प्रवृति के ये एंकर / 
  • जिनका व्यक्तित्व ही है भयन्कर / 
  • समाज को ये क्या जगायेंगे / 
  • वीभत्सता ही परोसते रह जायेंगे / 
  • == प्रदीप मानोरिया
  • 09425132060

Thursday, 22 January 2009

आज की फैशन

  • फैशन की दुनिया में जबरदस्त कमाल है |
  • अल्पता और लघुता से आया हुआ भूचाल है |
  • पूर्व के आविष्कारों में स्कर्ट की लंबाई घटती गई |
  • अब स्कर्ट ऊपर से टॉप नीचे से घट जाना है फैशन नई |
  • low waist स्कर्ट या जीन्स show waist टॉप का नया फैशन है |
  • उसकी मोबाइल से फोटोग्राफी लडकों का पेशन है |
  • ऐसे नये फैशन से सुसज्जित कन्यायें |
  • जब सायकिल रिक्शा पर बैठ कर जायें |
  • पीछे चलने वाली मोटर साईकिल की गति मंद और ड्राइवर की ऑंखे फैल जाती हैं |
  • इससे होती हैं सडक दुर्घटनायें और इसमें पेट्रोल की बर्बादी है |
  • इस नई low waist और show waist फैशन से देश का नुकसान है |
  • कपडों की मितव्वियता और पेट्रोल के अपव्यय से देश परेशान है |
प्रदीप मानोरिया 09425132060

Friday, 16 January 2009

जल पुनर्भरण आज की आवश्यक्ता - - WATER HARVESTING

  • सूखता जाता हुआ जल /
  • कुछ तो होगा इसका भी हल /
  • क्या ये प्रश्न करता है उद्वेलित /
  • इसे हल करने कभी हुए प्रेरित /
  • एकांगी रूप से प्रवृत्त व्यवहार में ही लीन हैं /
  • मिलता जहॉं से अरे मात्र लेने में तल्लीन हैं /
  • नीर के उपयोग के संग दुरूपयोग पर भी हैं डटे /
  • धीरे धीरे आज देखो नीर स्त्रोत भी हैं घटे /
  • क्यों नहीं अपनाते हम द्विमार्गी व्यवहार को /
  • जब लेने में हैं जो तत्पर फिर देने भी तैयार हों /
  • उपयोग के बाद व्यर्थ नाली में बहाना पानी को /
  • इंगित करता आगामी परेशानी और नादानी को /
  • जब धरा के स्त्रोत जल से नीर हम लेते रहे /
  • करें मेघ जल वापिस धरा को व्यर्थ अब वह बहे /
  • मेघ जल अभिषेक करना है धरा का अब यहॉं /
  • अन्यथा भावि समय में जल मिलेगा फिर कहॉं /
  • संग्रहित कर नीर बरखा निकट ही अर्पण करें /
  • घटते स्तर नीर का अब पुनि पुनि अरे वर्धन करें /
  • खर्च जीवन में अनेकों व्यर्थ भी धन जाय है /
  • व्यय करें कुछ धन भी इसमें ये धरा का न्याय है /
THOUGHTS COMPILED BY PRADEEP MANORIA

Saturday, 10 January 2009

बूढी आशा

आशाओं से भरी निगाहें , मन कितना मजबूर है |
तन जर्जर सामर्थ्य नहीं है , दुःख ही दुःख का पूर है ||
सर्द रात तन रहे ठिठुरता , यह दरिद्र संजोग है |
हाथ में चिंदी असमंजस है , क्या इसका उपयोग है ||
चेहरे पर झुर्री का जाला , निर्धनता का नूर है  .......
आशाओं से भरी निगाहें , मन कितना मजबूर है |
तीन पहर तो बीत चुके हैं ,आई जीवन की सांझ है |
इनके लिए तो सुख की जननी , रही सदा ही बाँझ है ||
सुर सरगम मर्सिया हैं गाते , सुख खट्टे अंगूर है ........
आशाओं से भरी निगाहें , मन कितना मजबूर है |
शिशिर बसंत हेमंत शरद , ऋतू सब ही आनी जानी |
अर्ध वस्त्र और भोजन आधा, जीवन की है यही कहानी ||
फ़िर भी जीवन जीते जाते , ईर्ष्या से रह दूर है ...........
आशाओं से भरी निगाहें , मन कितना मजबूर है |
दूर ये नज़रें   देख रही हैं, सुख की कुछ परछाईं हो |
भाग्य  विधाता  को भी शायद याद हमारी आई हो ||
दुःख भोगें  और सपने  देखें इसमे नही कुसूर  है ....
आशाओं से भरी निगाहें , मन कितना मजबूर है |
तन जर्जर सामर्थ्य नहीं है , दुःख ही दुःख का पूर है ||
प्रदीप मानोरिया   अशोकनगर (MP) संपर्क 094 251 32060 
The picture by coutsey of shunya.net  

Wednesday, 7 January 2009

मौसम

मौसम का ये मिज़ाज हुआ खुशगवार है |
आयेंगे वो जो पास, मेरे इंतज़ार है |
वो दूर नहीं पास मेरे जान लीजिये |
है चश्म में रूख वो हसीं मेरे आज है |
मौसम का ये मिज़ाज हुआ खुशगवार है |
जुल्फों के पेंचों खम है भला स्याह क्यूं बडे |
दिन में हुई है शाम यहॉं गुल की बहार है |
मौसम का ये मिज़ाज हुआ खुशगवार है |
दिल की करें क्या बात भला इश्क के सिवा |
तेरा ही है वज़ूद यहॉं उसका खुमार है |
मौसम का ये मिज़ाज हुआ खुशगवार है |
तन्हाइयों में याद तेरी क्यों इतना सताती |
आ जाओ अब ना देर करो दिल बेकरार है |
मौसम का ये मिज़ाज हुआ खुशगवार है |
आयेंगे वो जो पास मेरे इंतज़ार है |
प्रदीप मानोरिया 
09425132060